पीओ रजनी रामपाल केस में पुलिस पर गिरी गाज, झूठी एफआईआर पर एसीपी विक्रम नेहरा समेत 5 अफसर कटघरे में
पीओ रजनी रामपाल से जुड़े मुकदमों में अब कानून का डंडा पुलिस पर ही चल पड़ा है। झूठी एफआईआर दर्ज करने और हरियाणा मानवाधिकार आयोग के आदेशों को खुलेआम नज़रअंदाज़ करने के आरोप में एसीपी विक्रम नेहरा सहित पंचकूला के पांच पुलिस अधिकारियों पर मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है।
हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों को शो-कॉज नोटिस जारी कर प्रत्येक पर ₹20-20 हजार का जुर्माना लगाने की कार्रवाई शुरू कर दी है। आयोग ने साफ कहा है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई अवहेलना का है।

कमीशन के आदेशों को रौंदने का आरोप
आयोग की टिप्पणी बेहद सख्त है। आदेश में कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों ने आयोग के वैध निर्देशों की खुली अवहेलना कर कानून और मानवाधिकारों की मर्यादा को तार-तार किया, जो सीधे-सीधे मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का उल्लंघन है।

इन पुलिस अधिकारियों पर गिरी कार्रवाई की तलवार
मानवाधिकार आयोग द्वारा जिन अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए हैं, वे हैं—
- एसीपी विक्रम नेहरा, सेक्टर-5, पंचकूला
- एसीपी दिनेश, सेक्टर-7, पंचकूला
- एसीपी राकेश, सेक्टर-14/20, पंचकूला
- एसएचओ रूपेश, सेक्टर-5, पंचकूला
- एसएचओ हरि राम, सेक्टर-14, पंचकूला
- एसएचओ सोमवीर ढाका, सेक्टर-20, पंचकूला

कानूनी मोर्चे पर मजबूत पैरवी
शिकायतकर्ता आकाश भल्ला की ओर से इस मामले की प्रभावी पैरवी एडवोकेट करणवीर नंदा (पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट), एडवोकेट दीपांशु बंसल और एडवोकेट साजल बंसल द्वारा की जा रही है।
कानूनी टीम ने आयोग के समक्ष दस्तावेज़ी साक्ष्यों के साथ यह साबित किया कि पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर तथ्यों के विपरीत और दुर्भावनापूर्ण थी।
अब जवाब देना होगा—क्यों न हो सख्त कार्रवाई
मानवाधिकार आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे यह स्पष्ट करें कि धारा 13 के तहत उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए, जिसमें जुर्माने के साथ-साथ कठोर प्रशासनिक और कानूनी कदम भी शामिल हो सकते हैं।
वर्दी के पीछे छिपे अफसरों को कड़ा संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन अधिकारियों के लिए कड़ी चेतावनी है जो वर्दी की आड़ में कानून को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश करते हैं। यह फैसला साफ संदेश देता है कि अब कानून से ऊपर कोई नहीं—न कुर्सी, न वर्दी।



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