खरी-खरी : दोस्त – दोस्त न रहा
मोदी की अमरीका यात्रा और ट्रंप मुलाकात पर विशेषहा
जब कोई किसी के जबरन गले पड़ता है तो ऐसा ही हस्श्र होता है जैसा अमेरिका में हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित ना करके जो अपमान किया वह भले ही नरेन्द्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर अपमानजनक महसूस नहीं हुआ हो लेकिन 140 करोड़ राष्ट्रभक्त देशवासियों ने इसे भारत का अपमान माना है। फिर भी जबरदस्ती “मान ना मान मैं तेरा मेहमान” की तर्ज पर मोदी अमेरिका जाकर ट्रम्प के गले पड़े और ट्रम्प ने भारत में 2014 से लेकर अभी तक (तीसरे टर्म में भी) एक भी प्रेस कांफ्रेंस ना करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका में अपने साथ ज्वाइंट प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाकर जो फजीहत कराई वह ऐतिहासिक कही जायेगी। भारत का गोदी मीडिया अपने प्रधानमंत्री से जिन सवालों को आज तक पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया उन सवालों को अमेरिकी मीडिया ने सरेआम पूछकर भारतीय प्रधानमंत्री को “भई गति सांप छछूंदर केरी, निगलत-उगलत पीर घनेरी” वाली स्थिति में खड़ा कर दिया। सवाल चूंकि मोदी के मित्र कहे जाने वाले अर्थवादी गौतम अडानी से जुड़ा हुआ है तो फिर वे कैसे कोई स्पष्ट जवाब दे सकते थे इसलिए उन्होंने जैसे तैसे किन्नरी नौटंकी करते हुए बचकाना सा जवाब देकर पिंड छुडाया।
14 फरवरी 2019 को दोपहर 3 बजे जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में 40 सैनिकों की असमय शहादत हो जाती है। आज 6 साल बाद भी मोदी सरकार पुलवामा हमले का सच देशवासियों के सामने नहीं ला पाई है। मोदी सरकार के क्रिया कलाप पुलवामा हमले का सच जानने के लिए कोई कमेटी या कोई आयोग गठन करने के बजाय पल्ला झाड़ते नजर आये हैं। मोदी पार्टी से जुड़े हुए तथाकथित छद्म राष्ट्रवादी आज तक मोदी – शाह से यह सवाल करने का साहस आज तक नहीं जुटा पाये हैं कि “हमले में इस्तेमाल किया गया 300 किलोग्राम आरडीएक्स कहाँ से आया ? बटालियन के जाने से पहले सड़क मार्ग को सैटेनाइजड क्यों नहीं किया गया ? सैनिकों को बुलेट प्रुफ गाड़ी से क्यों नहीं भेजा गया ? सैनिकों को हवाई मार्ग से क्यों नहीं भेजा गया ? हमले के बाद गवर्नर को चुप रहने की धमकी किसने और क्यों दी ? हमला किसकी नाकामी से हुआ ? डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेंस जब एक अमेरिकी जर्नलिस्ट ने पीएम मोदी से सवाल पूछा कि क्या आपने ट्रम्प के साथ हुई बैठक में अमेरिका में आर्थिक अपराध करने वाले भारतीय कार्पोरेट गौतम अडाणी के मामले पर चर्चा की और क्या आपने मामले में ट्रम्प से कार्रवाई करने की बात कही ? अमेरिकी जर्नलिस्ट के इस अकल्पनीय – अप्रत्याशित सवाल से अचकचाये से रह गये पीएम मोदी ने जिस लहजे में जो जवाब दिया उससे जर्नलिस्ट द्वारा पूछा गया सवाल पूरे कांफ्रेंस में भारी पड़ गया। किसी ने नहीं सोचा था कि एक झटके में अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बढ़ते और करीब होते संबंधों के अश्क तले तमाम मुद्दे धराशायी हो जायेंगे।
अमेरिकी जर्नलिस्ट के सवाल तले गौतम अडाणी और उससे जुड़े अपराध और उस अपराध के सिलसिले में ट्रम्प के साथ संवाद को लेकर क्या कुछ हुआ उसको बताने का था लेकिन पीएम मोदी सीधा जवाब देने के बजाय लोकतंत्र, वसुधैव कुटुम्बकम का जिक्र करते हुए इसे एक निजी मामला बताते हुए अमेरिकी जर्नलिस्ट के सवाल का जबाव देने में पूरी तरह से असफल रहे। प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने पीएम नरेन्द्र मोदी के जवाब पर चुटकी लेते हुए ट्यूट कर तूल दे दिया “देश में सवाल पूछो तो चुप्पी, विदेश में पूछो तो निजी मामला। अमेरिका में भी मोदी जी ने अदाणी जी के भृष्टाचार पर पर्दा डाल दिया। जब मित्र का जेब भरना मोदीजी के लिए राष्ट्र निर्माण है तब रिश्वतखोरी और देश की सम्पत्ति को लूटना व्यक्तिगत मामला बन जाता है”। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ खड़े होकर दुनिया को ये संदेश दे दिया कि अगर कोई कार्पोरेट मित्र उनके साथ खड़ा है तो फिर उसे बचाने के लिए हर तरीके अपनाये जायेंगे यानी भारत के भीतर गौतम अडाणी को लेकर गूंजती हुई आवाज को अन्तरराष्ट्रीय मंच पर एक निजी मामले में तब्दील कर दिया जायेगा। इस खुली कहानी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाशिंग्टन डीसी में लिख डाला।
इसके साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी बता दिया कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान समय में उनसे बड़ा कोई बिजनेस मैन दुनिया में नहीं है। अमेरिका बाजार में कब्जा करने निकला है और उसका ध्येय दूसरे देशों से आने वाले सामानों पर अधिकाधिक टेरिफ लगाकर सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना और डालर बटोरना है। अमेरिका ने साफ – साफ बता दिया कि भारत हाथ हिला – हिला कर गले पड़ सकता है, दोस्ती का नया आयाम जोड़ सकता है लेकिन जब बात बिजनेस की होगी तो कोई समझौता नहीं होगा। यानी व्यापारिक गतिविधियों के जरिए भारत को आने वाले वक्त में तकरीबन 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा और इतना ही फायदा अमेरिका को होगा। मोदी ट्रम्प से कितना भी याराना दिखलायें मगर यह भी हकीकत है कि ट्रम्प की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रशिया राष्ट्रपति पुतिन से भी यारी प्रगाढ़ है जबकि भारत के साथ उनकी दोस्ती हाथ मिलाने और गले मिलने तक ही सीमित है,। इसलिए वे उनके खिलाफ एक शब्द बोलने वाले नहीं हैं।
भारत का शेयर बाजार लगातार ढहढहा रहा है जिसे थामने वाला कोई नहीं है। अमेरिका जिस रास्ते चल निकला उससे साफ संकेत मिलता है कि वह अपना ज्यादा से ज्यादा माल भारत में बेचेगा। अमेरिका ने व्यापारिक डील के तहत बताया कि वह भारत को बड़ी तादाद में माल बेचेगा जिसमें प्रमुख रूप से तेल, गैस, सेना से जुड़े हार्डवेयर, एफ – 35 लड़कू विमान शामिल हैं। (एफ – 35 जेट के बारे में नवभारत टाइम्स लिखता है कि इस एफ 35 जेट पर खुद अमेरिकी सुरक्षा मुख्यालय पेंटागन सवाल उठा चुका है – 65 खामियां 12 हादसे वाला एफ 35 जेट) । जबकि अभी तक भारत रशिया से 30 फीसदी डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीद रहा है। लेकिन अब रास्ते बंद होंगे। चीन और रूस भी जब व्यापारिक संबंधों के साथ अमेरिका के पाले में खड़े होंगे तो भारत अपनी राजनीति को कैसे साधेगा। प्रश्न यह है कि भारत में जिन सामानों को बेचने का ऐलान अमेरिका का राष्ट्रपति कर रहा है उन्हें खरीदने की सहमति का जिक्र अभी तक न तो पीएम मोदी ने किया है न ही पीएमओ सहित संबंधित मंत्रालयों ने तो क्या पीएम मोदी ने अन्तरराष्ट्रीय बाजार से सामान खरीदने की सौदेबाजी का अधिकार भी अमेरिका के हाथों सौंप दिया है ?
व्यापारिक संबंधों के मद्देनजर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बीच 36 का आंकड़ा चल रहा है क्योंकि अमेरिका जानता है कि यूरोप के साथ बार्गेनिंग करना आसान नहीं है। यूरोपीय यूनियन बाजार के लिए भारत और चीन की ओर देख रहा है और अमेरिका यूरोपीय यूनियन को चमका रहा है। ट्रम्प ने साफ तौर पर कहा कि उसकी पाॅलिसी “अमेरिका ग्रेट अगेन” है। नकल करने में सिध्द हस्त नरेन्द्र मोदी भी कहने लगे हैं “इंडिया ग्रेट अगेन”। पीएम मोदी का यह कैसा इंडिया ग्रेट अगेन है कि हाल ही में पेश किए गए आम बजट में अमेरिकी चीजों पर टेरिफ घटाया गया है। शायद ब्रिक्स की मौजूदगी भी अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आंखों में चुभ रही है तभी तो वे खुलेतौर पर कह रहे हैं कि ब्रिक्स अगर एक कदम भी डालर को हानि पहुंचाने की दिशा में बढता है बर्दास्त नहीं किया जायेगा और ब्रिक्स में शामिल देशों के ऊपर शतप्रतिशत टेरिफ लगाया जायेगा।
डियर माई फ्रेंड्स की हकीकत यह है कि टेरिफ को लेकर अमेरिका किसी भी देश से समझौता करने को तैयार नहीं है। इजराइल, जापान, जार्डन के राष्ट्राध्यक्षों को भी मुलाकात के बाद ट्रम्प ने कोई तबज्जो नहीं दी। भारत के साथ भी वही कुछ किया जा रहा है। एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रम्प से हुई मुलाकात के बाद राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियां खुलेतौर पर संकेत दे रहे हैं कि दरअसल भारत को अब सोचना होगा कि उसका अपना स्वावलंबन, उसकी अपनी आत्मनिर्भरता, मेक इन इंडिया का नारा और विकसित भारत होने की दिशा में भारत के भीतर 140 करोड़ देशवासियों का योगदान कैसे होगा। इसको लेकर क्या वाकई में कोई विजन मोदी सत्ता के पास है भी या नहीं। अन्तरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे देशों के साथ संबंध बनाने और कूटनीति साधने की दिशा में पहले से ही भारत के लोगों की स्थितियां नाजुक है और अब व्यापारिक जगत में भी स्थितियां नाजुक हो चली है। व्यापारिक निवेश को लेकर अन्तरराष्ट्रीय तौर पर भारत का शेयर बाजार भी मुश्किल हालात में है। भारत की मुश्किल यह है कि चंद हाथों में सिमटी हुई पूंजी पहली बार अन्तरराष्ट्रीय तौर पर अमेरिका के सामने नतमस्तक है।
जबरन अमेरिका जाकर लौटे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा के संबंध में यही कहा जा सकता है कि “एकबार फिर ट्रम्प सरकार, हाउडी मोदी, सावन के झूले” के अश्क तले “हजारों ख़्वाहिशें ऐसी थी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमॉं लेकिन फिर भी कम निकले, बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले” । नमकहलाली की सारी उम्मीदें टूटने के बाद यही कह सकते हैं कि” हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था, मेरी किश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था”।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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