मोदी सरकार का लबालब खजाना – ढोल में पोल
दुनिया के आठवें आश्चर्य में तब्दील होने के लिए आउटर पर खड़ी है भारत की इकोनॉमी !
खरी खरी
भारत में नौकरियां नहीं हैं, इंडस्ट्री नहीं हैं, सब्सिड देने के लिए पैसा नहीं है, युनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) को देने के लिए पैसा नहीं है, हेल्थ को इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ सरकारी स्तर पर सशक्त करने के लिए पैसा नहीं है, देश के छात्रों को देश के भीतर ही सस्ती और विश्वस्तरीय शिक्षा देने के लिए अलग से सेक्टर बनाने के लिए पैसा नहीं है, हर राज्य के लिए घोषित की गई कल्याणकारी योजनाओं को चलाने के लिए पैसों का टोटा है, देश की 40 करोड़ जनता खुद कमाकर पेट भरने के बजाय सरकार द्वारा दी जाने वाली खैरात 5 किलो अनाज पर जिंदा रहने मजबूर है, सरकार बेरोजगारी पर अंकुश लगाने में फेल हो चुकी है, और इसके उल्ट सरकार कह रही है कि खजाने में पैसा बढ़ रहा है, देश की इकोनॉमी 4 ट्रिलियन डॉलर पार कर 5 ट्रिलियन डॉलर में बदलने की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। तो फिर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पैसा है कहां पर ? यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या वाकई देश की आर्थिक स्थिति नाजुक है, सब कुछ कर्ज के भरोसे चल रहा है, जितनी भी लाभार्थी योजनाएं हैं वे दम तोड़ने की कगार पर हैं, जो सब्ज बाग परोसा जा रहा है वह सब ढोंग है, प्रोपेगेंडा के अलावा और कुछ भी नहीं है ?
सरकार का एक मंत्रालय है सांख्यिकी मंत्रालय। उसका एक डाटा कहता है कि देश में जो भी रोजगार या रोजगार से जुड़े हुए कामकाज हो रहे हैं उसमें 20 फीसदी से कम 19.90 फीसदी पुरुष जुड़े हैं यानी 80 फीसदी से ज्यादा पुरुष रोजगार से जुड़े हुए नहीं हैं। महिलाओं की स्थिति तो इससे भी बदतर है। 95 फीसदी से ज्यादा महिलायें रोजगार से दूर हैं, रोजगार से जुड़ी हुई महिलाओं की संख्या सिर्फ 4.90 फीसदी है। जबकि सरकार मुनादी पीट – पीट कर कह रही है कि सोना, डॉलर बढ़ गया है, खजाना लबालब है, हमारी इकोनॉमी आसमान से बातें कर रही है। यही मंत्रालय यह भी बता रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र के लगभग 88 फीसदी लोग रोजगार से जुड़े हुए नहीं हैं। शहरी क्षेत्र की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है, वहां पर भी 86 फीसदी से ज्यादा लोग रोजगार से वंचित हैं, केवल 13.80 फीसदी लोग ही रोजगार से जुड़े हुए हैं। पूछा जाना चाहिए कि कौन सा ऐसा बड़ा काम है जो सब करते हैं तो उसका उत्तर है सेल्फ केयर और सोना (सोने का मतलब निद्रा – 49.3 फीसदी पुरुष, 49.3 फीसदी महिला)। देश की लगभग 20 फीसदी महिलाओं और लगभग 4 फीसदी पुरुषों को काम करने के बाद भी पैसा नहीं मिलता है।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जिसे पीएम बांटते हुए फोटो खिंचवाने से नहीं चूकते हैं लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया होगा कि उसमें भी 45 फीसदी की कमी आ गई है। छोटे और सीमांत किसानों को लेकर खेती के क्षेत्र में परम्परागत कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री कृषि संचय योजना, मार्केट इंटरवेशन स्कीम एंड प्राइस सपोर्ट स्कीम आदि के लिए सरकार के पास पैसे का संकट है। सरकार की दयनीय आर्थिक स्थिति को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि फर्टिलाइजर सब्सिडी देने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं था तो सरकार को बकायदा पार्लियामेंट में प्रस्ताव लाकर पैसे की गुहार लगानी पड़ी। यह बात दीगर है कि पार्लियामेंट में बहुमत होने से सरकार को मेहनत नहीं करनी पड़ी, जबकि इसके लिए बजट में प्रावधान किया गया है। तो फिर वही सवाल कि आखिर पैसा कहां गायब हो गया ? दरअसल योजनाओं का सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है राज्य दर राज्य घूम – घूम कर योजनाओं की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री के प्रचार प्रसार में, क्योंकि राज्यों को कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना तथा क्रेडिट लिंक सब्सिडी स्कीम (हाउसिंग सेक्टर) में पैसे का संकट है। एज्युकेशन के क्षेत्र में घोषित की गई योजनाओं के लिए भी पैसा नहीं है। सोशल सिक्योरिटी को लेकर लागू की गई प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना में पहले 10 फीसदी फिर 20 फीसदी, 38 फीसदी, 46 फीसदी कम किया गया और अब पैसा नहीं है। बीमा कंपनी के पैसे देने की रफ्तार 18 फीसदी पर आकर ठहर गई है। अटल पेंशन योजना का तकरीबन 72 फीसदी पैसा गायब हो गया है। एमएसएमई (MSME) के बारे में सरकार कहती है कि इसके जरिए रोजगार देंगे और तकरीबन आधा दर्जन योजनाओं का एलान भी किया लेकिन वहां भी पैसे का टोटा पैदा हो गया। बैंक के जरिए योजना में दी जाने वाली रकम की हालत यह है कि हर बैंक के अधिकारी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट कर कहते फिर रहे हैं कि कोई स्कीम हो तो हमारे बैंक के जरिए चलवा लीजिए यह जानते हुए भी कि 100 रुपये के बजट का 25 रुपया ही मिलेगा फिर भी 25 रुपया ही सही हमारे बैंक में तो जमा होगा। सरकार द्वारा घोषित की गई योजनाओं की लम्बी फेहरिस्त है। गरीब कल्याण रोजगार अभियान, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, स्वच्छ उद्यमी योजना, कर्नाटक की उद्योगिनी स्कीम यहां के हाल भी बेहाल ही हैं। सरकार ने रोजगार न दे पाने के एवज में मुद्रा योजना नामक स्कीम लागू की मगर वहां भी पैसे का संकट आन खड़ा हो गया तो सरकार ने पिछले साल के मुकाबले (5 लाख 32 हजार करोड़ रुपये) कम कर दिया (4 लाख 22 हजार करोड़ रुपये)।
योजनाओं को पूरा करने के लिए पैसों के टोटे का सबसे ज्यादा असर पड़ता है राज्य सरकारों पर। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल में लागू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना, लाड़ली बहना योजना मोहन यादव के पर्ची मुख्यमंत्री बनते ही संकट में आ गई है। महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार सहित दूसरे राज्यों की हालत भी बदत्तर ही है। राज्यों के लिए केन्द्र द्वारा घोषित की जाने वाली योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए 60 फीसदी केन्द्र और 40 फीसदी राज्य का शेयर होता है मगर आज की स्थिति में केन्द्र लगभग 32 फीसदी ही दे रहा है और अपनी नाजुक आर्थिक स्थिति के चलते राज्य 20 फीसदी ही लगा पा रहे हैं। राज्य सरकारें अपने जीडीपी के 25 – 30 फीसदी कर्जे के बोझ तले दबी हैं जो उन्होंने रिजर्व बैंक से लिया हुआ है। पंजाब 45 फीसदी, हिमाचल प्रदेश 43 फीसदी, पश्चिम बंगाल 37 फीसदी, राजस्थान 36 फीसदी, उत्तर प्रदेश 33 फीसदी, मध्य प्रदेश 32 फीसदी अपने जीडीपी के मुकाबले कर्ज में डूबा हुआ है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक योजनाओं को पटरी पर लाने के लिए तत्काल कम से कम 50 लाख करोड़ रुपये चाहिए। और योजनाओं को लागू कराने के लिए सरकार के हाथ खाली हैं। सरकार सिर तक कर्ज में डूबी हुई है यानी उधार लेकर घी पी रही है।
देश के भीतर उत्पादन गायब है, एमएसएमई को सपोर्ट मिल नहीं पा रहा, स्टार्ट अप से जुड़ा तबका हांफ रहा है। 2029 (लोकसभा चुनाव) तक हर दूसरा नवजवान हाथ में डिग्री लिए बेरोजगारी की जमीन पर खड़ा होकर या तो चुनावी राजनीति के नारे लगाता दिखेगा या फिर विस्फोटक हालात पैदा करेगा क्योंकि उस दौर में सरकार के पास जितनी नौकरियां होंगी उससे 80 गुना ज्यादा बेरोजगार सड़कों पर होंगे। अनआर्गनाइज सेक्टर 2014 में जितना वेतन दे रहा था उसमें भी लगभग 16 फीसदी की कटौती हो गई है। जब देश के पास योजनाओं को चलाने के लिए पैसा नहीं है तो फिर बचा क्या है। दुनिया भर में फैले हुए तकरीबन 3 करोड़ भारतियों के सामने पहली बार मुश्किल हालात पैदा हो रहे हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका से होने के संकेत वहां के वाइस प्रेसीडेंट ने यह कहकर दे दिए हैं कि ग्रीन कार्ड होल्डर भी यहां परमानेंटली नहीं रह पायेंगे, उनकी भी समीक्षा होगी। मतलब भारत के बाहर रह रहे वे भारतीय जो भारत की मौजूदा राजनीतिक सत्ता को लेकर तालियां बजा रहे थे उनके लिए एक मौका है कि वे ताली बजाते हुए देश की परिस्थितियों के साथ चलने की स्थिति में आ जायें और तब दुनिया जान पायेगी कि भारत की इकोनॉमी दुनिया के 7 आश्चर्यों से भी ज्यादा बड़े आश्चर्य में तब्दील हो चुकी है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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