क्या है डेड मैरिज ? साथ रहते हुए भी अकेलेपन की कैद !
भारत में लाखों कपल्स ऐसे हैं जो शादीशुदा होने के बावजूद “डेड मैरिज” में जी रहे हैं। समस्या यह है कि अधिकतर लोगों को यह तक नहीं पता कि डेड मैरिज क्या होती है।
क्या है डेड मैरिज?
डेड मैरिज का मतलब है—एक ही छत के नीचे रहते हुए भी भावनात्मक और मानसिक रूप से अकेला महसूस करना। इसमें पति-पत्नी केवल जिम्मेदारियों तक सीमित होकर साथ रहते हैं।
बातचीत सिर्फ बच्चों की फीस, घर का सामान या रोज़मर्रा की ज़रूरतों तक सीमित हो जाती है।
रिश्तेदारों के घर जाना केवल रस्म अदायगी बन जाता है, उत्साह गायब हो जाता है।
शारीरिक संबंधों में भी गर्माहट की जगह केवल खानापूर्ति रह जाती है।
कई-कई दिन बिना किसी सार्थक बातचीत के निकल जाते हैं।
घर में साथ रहकर भी एक-दूसरे से जुड़ाव नहीं होता, बस “रूममेट” जैसा रिश्ता बन जाता है।
क्यों खतरनाक है डेड मैरिज?
ऐसे रिश्ते धीरे-धीरे मानसिक तनाव, अवसाद और असंतोष को जन्म देते हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कपल्स इसे “नॉर्मल” मानकर जीते रहते हैं और समस्या को स्वीकार ही नहीं करते।
ऑनलाइन फ्रॉड रिलेशनशिप्स से सावधान
कई बार महिलाएँ, पति से भावनात्मक दूरी के कारण इंटरनेट पर किसी नए शख्स से जुड़ जाती हैं। शुरुआत में ये लोग बेहद मोहक लगते हैं—रात-रात भर बातें, चाँद-तारे तोड़ लाने के वादे। लेकिन समय बीतते ही यह रिश्ता शोषण और निराशा में बदल जाता है। ऐसे “फ्रॉड रिलेशनशिप्स” में अक्सर पुरुष बिना किसी जिम्मेदारी लिए वैवाहिक रिश्ते जैसे फायदे उठाना चाहते हैं।
समाधान क्या है?
अगर पति-पत्नी के बीच संवाद और जुड़ाव कम हो गया है, तो इसका हल किसी तीसरे व्यक्ति को जीवन में लाना नहीं है।
सबसे पहले आत्मचिंतन करें और अपने साथी से खुले संवाद की कोशिश करें।
यदि फिर भी समाधान न निकले तो काउंसलिंग या थेरेपी से मदद लें।
खुद के लिए समय निकालें—नए कोर्स, स्किल या हॉबी से खुद को मजबूत बनाएं।
याद रखें
प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन गलत इंसान के साथ जुड़ना हमेशा तकलीफ़ देता है। असली समाधान अपने रिश्ते को समझने और खुद को मजबूत बनाने में है, न कि तात्कालिक आकर्षणों में।
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