देश को ढकेला जा रहा है गुलामी की ओर ! खरी खरी
युद्ध की पराजय से होने वाली गुलामी से ज्यादा बदतर है दूसरे देशों की टेक्नोलॉजी और करेंसी पर होने वाली निर्भरता
देश को ढकेला जा रहा है गुलामी की ओर !
देश का दुर्भाग्य है कि जो करार भारत सरकार और अमरीकी सरकार के बीच होना चाहिए था और उसकी घोषणा भी भारत और अमरीकी सरकार को करनी चाहिए थी (क्योंकि यह करार भारत की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है) मगर करार भारत के दो और अमेरिका के एक निजी कार्पोरेट के बीच हो रहा है और उसकी घोषणा भारत के दोनों निजी कार्पोरेट के लोग अलग – अलग दिनों पर कर रहे हैं। देश की इससे भी बड़ी बदकिस्मती यह है कि भारत सरकार ने इस करार पर अपना मुंह अभी तक नहीं खोला है। क्या यही है मोदी सरकार का अमृत काल, संगोल और डेमोक्रेसी स्टाइल। जहां पर सवाल तो हैं मगर जवाब नहीं हैं और भारत का कायर और नंगाई मीडिया सवालों के जवाब पूछेगा नहीं।
इलाॅन मस्क की मालिकाना हक वाली अमेरिकी स्टारलिंक जिसके पास पृथ्वी की निचली कक्षा में 7 हजार से ज्यादा सेटेलाइट का सबसे बड़ा नेटवर्क है जिसके जरिए वह दुनिया के 100 से ज्यादा देशों को इंटरनेट सर्विस बेचती है जिससे उन देशों में स्ट्रीकिंग, आनलाईन गेमिंग, वीडियो काल आदि आसानी से संभव हो रहे हैं। दो दिन के भीतर भारत की दो सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धात्मक इंटरनेट प्रदाता कंपनी सुनील भारती मित्तल के मालिकाना हक वाली एयरटेल और मुकेश अंबानी के मालिकाना हक वाली जियो का करार इलाॅन मस्क के मालिकाना हक वाली स्टारलिंक से हो जाने का सबसे बड़ा फायदा भारत को यह होगा कि वह उन क्षेत्रों में भी सर्विस दे सकता है जहां पर ट्रेडिशनल ब्राडबैंड प्रोवाइडर्स अपनी सर्विस नहीं दे पाते हैं, जिनमें ग्रामीण और दूरदराज के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं। भारत के लिए स्टारलिंक एक गेम चेंजर साबित हो सकता है क्योंकि यहां पर आज भी दूरदराज के कई इलाकों में इंटरनेट की पहुंच नहीं हो पाई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2024 तक ग्रामीण टेली-डेंसिटी 59.1 फीसदी थी। स्टारलिंक की सर्विस मिलने से देश के दुर्गम इलाकों में शिक्षा और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो सकता है। सुनील भारती मित्तल और मुकेश अंबानी की इंटरनेट प्रदाता कंपनियों का इलाॅन मस्क की कंपनी के करार पर भारत के सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ट्वीट कर बधाई तो दी लेकिन न जाने कौन सा अदृश्य भूत वैष्णव को दिखाई दे गया कि चंद मिनट में ही उन्होंने अपने ट्यूट को डिलीट कर दिया। मुकेश अंबानी के न्यूज चैनल NEWS 18 ने अश्वनी वैष्णव के ट्यूट पर खामोशी बरती मगर गौतम अडानी के न्यूज चैनल NDTV ने इसे जगजाहिर कर दिया। इसे अंबानी और अडानी के पर्दे के पीछे की जंग कहा जा सकता है।
एयरटेल – जियो के साथ हुए स्टारलिंक के करार से एक बात तो साफ हो गई है कि आने वाले समय में किसी भी देश की सीमा कोई मायने नहीं रखेगी और देशों पर कब्जा करने के लिए सबसे बड़े हथियार होंगे टेक्नोलॉजी और करेंसी। करेंसी के जरिए किसी भी देश को कमजोर बनाकर उसे हथेली पर नचाया जा सकता है। टेक्नोलॉजी भी कमोवेश ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें किसी भी देश को टेक्नोलॉजी पर निर्भर करके अपने सामने घुटनाटेक किया जा सकता है। जरा सा पीछे चलकर मोदी सरकार के ही पन्ने पलटे जाएं। 2021 याने 4 बरस पहले भी स्टारलिंक भारत की सीमा में घुसना चाहता था मगर कठोर भारतीय कायदे – कानून के चलते यह संभव नहीं हो पाया था। इसी तरह के कड़े नियमों – कायदों और आरबीआई के द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों के कारण 2017 – 18 में भारत में आने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली क्रिप्टो करेंसी भी नहीं आ पाई। अमेरिका में चंद महीने पहले सत्ता बदली और बदली हुई सत्ता ने अमेरिका फर्स्ट के नारे के अश्क तले दुनिया को बताना शुरू कर दिया है कि अमेरिका का मतलब टेक्नोलॉजी है, अमेरिका का मतलब करेंसी याने डाॅलर है, अमेरिका का मतलब क्रिप्टो करेंसी है या डिजिटल इकोनॉमी है, मगर इसके बावजूद भी दुनिया में कई ऐसे विकासशील और गरीब देशों की कतार है जो अपनी सम्प्रभुता को अपने हाथ में समेटे रखना चाहते हैं।
लेकिन भारत की इंटरनेट की दुनिया के सबसे बड़े प्रतिस्पर्धात्मक खिलाड़ी एयरटेल और जियो के मालिकों ने अमेरिकी कंपनी स्टारलिंक के मालिक से एक-एक दिन के अंतराल में समझौता कर लिया। सोशल मीडिया पर तो उसकी पकड़ है ही अब भारत का इंटरनेट भी उसके हाथों में होगा। एयरटेल और जियो ने परस्पर स्पर्धा करते हुए जिस तरह से अपनी पूंजी के आसरे भारत के गांव – गांव तक इंटरनेट की सेवाओं का विस्तार कर यूजर्स की संख्या में इजाफा किया है वह जगजाहिर है। लेकिन अमेरिका ने सत्ता बदलते ही दुनिया को पाठ पढाना शुरू कर दिया कि ताकत और अमेरिका एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। भारत को अपने शिकंजे में लेकर अमेरिका ने जब टेरिफ का जिक्र किया तो देश के उन बड़े – बड़े कार्पोरेटस के सुथन्ने ढीले हो गए जो एक्सपोर्ट के जरिए अच्छा खासा कमा रहे हैं। तो पहला इंटरनेट का रास्ता है जो लगभग लगभग खुल गया है। दूसरा रास्ता है भारत में प्रवेश करने की कतार में खड़ी आटोमोबाइल कंपनियों को लाने का। वह भी खुलने ही वाला है क्योंकि इलाॅन मस्क ने अपनी कार कंपनी टेस्ला को भारत के बाजार में बेचने की बात कही है। तीसरी 2017-18 से भारत में घुसने के लिए आउटर पर खड़ी है क्रिप्टो करेंसी। इसके लिए भी जल्द ही ग्रीन सिग्नल हो जायेगा क्योंकि भारत सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों ने कहना शुरू कर दिया है कि जब दुनिया के तमाम देश खुद को एक सीमा में नहीं बांध पा रहे हैं तो फिर हम कैसे अछूते रह सकते हैं।
आज की तारीख में सात हजार सेटेलाइट के जरिए दुनियाभर के 100 देशों में इंटरनेट की सर्विस दे रही स्टारलिंक के यूजर्स की तादाद तकरीबन 46 लाख है जबकि भारत में ब्राडबैंड के जरिए इंटरनेट सर्विस दे रही जियो के यूजर्स की संख्या ही 47 करोड़ से ज्यादा है। एयरटेल के 28-29 करोड़, Vi के 12 – 13 करोड़ तथा बीएसएनएल के 3 – 3.5 करोड़ यूजर्स अलग हैं। तो फिर स्टारलिंक से करार होने के बाद एयरटेल और जियो के तकरीबन 75 करोड़ यूजर्स स्टारलिंक के हो जायेंगे। तो कहा जा सकता है कि देश के भीतर जिसके पास इंटरनेट की ताकत होगी तो जाहिर है कि सब कुछ उसी की हथेली पर होगा। सेटेलाइट के जरिए इंटरनेट का मतलब बहुत साफ है कि उसके दायरे जो भी आता है चाहे वह जंगल हो दूरदराज का दुर्गम इलाका सब उसकी जद में होगा और उस पर अंकुश लगाना देश के बस में नहीं होगा।
देखने – सुनने में तो ऐसा ही लगता है कि मुकेश अंबानी और सुनील मित्तल की कंपनी का करार इलाॅन मस्क की कंपनी के साथ हुआ है लेकिन परिस्थितियां चुगली कर रही हैं कि यह करार भारत सरकार के पीएम और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच में हुआ है क्योंकि इस तरह का समझौता दो देशों के राष्ट्राध्यक्ष के बीच ही अपने-अपने देशों के नियम कायदे के भीतर रहकर किया जा सकता है।(भारत की जनता ने न तो मुकेश अंबानी को चुना है न ही सुनील भारती मित्तल को जनता ने तो बीजेपी के नरेन्द्र मोदी को वोट देकर चुना है) तो क्या भारत सरकार ने देश को जानकारी दिए बिना 2017 – 18, 2021 के नियम – कानूनों को बदल दिया है। सेटेलाइट के जरिए इंटरनेट, क्रिप्टो करेंसी की आमद का मतलब होगा अमेरिका की गुलामी। कारण अब तो देश चलाने के तौर – तरीके देश की सीमायें लांघ कर अन्तरराष्ट्रीय हो चले हैं (देश के कार्पोरेटस से निकल कर अन्तरराष्ट्रीय कार्पोरेटस के कांधे पर सवार हो गए हैं। तो क्या यह कहा जा सकता है कि जिस तरह से नरेन्द्र मोदी ने पीएम बने रहने के लिए दो कहार रखे हुए हैं नितीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू शायद उसी तर्ज पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत को अपनी मुठ्ठी में रखने के लिए इलाॅन मस्क के जरिए दो कहार रख लिए हैं मुकेश अंबानी और सुनील भारती मित्तल !
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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