बजट का एक एक पैसे का हिसाब
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बजट में पैसा कहां से आएगा और कहां को जाएगाई
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सरकार ने पार्लियामेंट के भीतर 12 लाख की कमाई वालों को इनकम टैक्स में राहत रियायत देकर यह कहते हुए महफिल लूट ली कि जो 1 लाख रुपये की कमाई इनकम टैक्स के जरिए सरकार को होती थी वह कम हो जायेगी। मगर सरकार ने पार्लियामेंट के भीतर इस बात को नहीं बताया कि पिछले साल की तुलना में इस साल 5 लाख करोड़ की कमाई ज्यादा होने वाली है। सवाल यह है कि ये पैसा कहां से आयेगा, किससे लिया जायेगा, क्या कोई बाहर का व्यक्ति तैयार है पैसे देने के लिए। ऐसा कुछ नहीं है। बजट के दस्तावेजों को खंगाला जाए तो तस्वीर साफ दिखने लगती है कि 5 लाख करोड़ और कहीं से नहीं जनता की जेब से ही बसूले जायेंगे मय सूद। इसलिए 12 लाख तक की कमाई करने वालों को ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं है। उनकी जेब भी ढीली होगी।
नेहरू काल से ही सरकार को न तो एग्रीकल्चर बजट में कोई दिलचस्पी रही है ना जनता के खून पसीने को सींच कर और उसकी गाढ़ी कमाई से चलाये जाने वाले पब्लिक सैक्टर अंडरटेकिंग (पीएसयू) में। सरकार की तो सारी दिलचस्पी होती है अपने पालिटिक्स ऐजेंडे को लेकर। इस बार का बजट है 50 लाख 65 हजार 345 करोड़ का और टैक्स पेयर से जो पैसा बसूला जायेगा वह है तकरीबन 48 लाख करोड़। इस साल सरकार को इनकम टैक्स में 1 लाख करोड़ की रियायत देने के बाद भी पिछले साल की तुलना में 2 लाख 7 हजार 72 करोड़ की ज्यादा कमाई होगी यानी पिछले साल आया था तकरीबन 12 लाख करोड़ तो इस साल आयेगा 14 लाख 38 हजार करोड़। सवाल तो बनता है कि जब सरकार टैक्स पेयर्स से 1 लाख करोड़ रुपये कम बसूली कर रही है तो फिर 2 लाख करोड़ से ज्यादा की बसूली कैसे होगी ?
जीएसटी में भी पिछले बरस की तुलना में 1 लाख 40 हजार 182 करोड़ अधिक आयेंगे। पिछली बार आये थे 10 लाख 30 हजार करोड़ इस बार आयेंगे 11 लाख 78 हजार करोड़। कार्पोरेट टैक्स भी ज्यादा मिलेगा लेकिन वह डायरेक्ट टैक्स और जीएसटी से कुछ कम। देश के भीतर इनकम टैक्स देने वाला जो तबका है उसमें सिर्फ 22 लोग ऐसे हैं जो कार्पोरेट रेंज में आते हैं। इनके पास देश की 50 फीसदी सम्पत्ति है लेकिन कार्पोरेट टैक्स मिलेगा 1 लाख 12 हजार 528 करोड़ बढकर 10 लाख 82 हजार करोड़ जो पिछले वर्ष था 9 लाख 70 हजार करोड़। कस्टम टैक्स के बारे में सरकारी आंकडा कह रहा है इस बार 2 लाख 40 हजार करोड़ बसूले जायेंगे जो पिछली बार के 2 लाख 35 हजार करोड़ से 5 हजार करोड़ ज्यादा होंगे। एक्साइज टैक्स से 2 लाख 50 हजार 250 करोड़ की कमाई होगी (बेसिक एक्साइज ड्यूटी से 38 हजार 180 करोड़ तथा दूसरी एक्साइज ड्यूटी से 2 लाख 12 हजार 70 करोड़)। सैस के रूप में (टोल को छोड़ कर) तकरीबन 66 हजार 750 करोड़ बसूले जायेंगे। इसके अलावा यूनियन टैरेटरी से भी लगभग 10 हजार 133 करोड़ टैक्स लिया जायेगा जो पिछली दफा 8 – 9 करोड़ के आसपास था। इन सब को एक थैले में रख दिया जाय तो होंगे 42 लाख 65 हजार 133 करोड़। बजट है 50 लाख 65 हजार 345 करोड़ का और सीधे तौर पर जो बसूली हो रही है वह 42 लाख 65 हजार 133 करोड़ की है ।
यानी अब बचते हैं लगभग 8 करोड़। ऐसा कतई नहीं है कि ये 8 करोड़ सरकार टैक्स के बगैर कमा लेगी। क्योंकि एक नान टैक्स रेवेन्यू भी होता है जिसके दायरे में सभी तरह की सर्विसेज आती हैं। उन सर्विसेज की बसूली सरकार कम्पनियों से करती है और कम्पनियां जनता से। मसलन कम्यूनिकेशन सर्विस से सरकार बसूलती है 82 हजार 443 करोड़। ट्रांसपोर्ट सर्विस से बसूली होती है लगभग 33 हजार 673 करोड़। इसी तरह एनर्जी सर्विस से मिलते हैं तकरीबन 22 हजार 656 करोड़। इसके अतिरिक्त दूसरी सर्विसिंग से सरकार लेती है 16 हजार 55 करोड़। डिवीडैंड प्राफिट के तौर पर भी सरकार को मिलते हैं तकरीबन 3 लाख 25 हजार करोड़। नान टैक्स रेवेन्यू से सरकार की कमाई हो जायेगी लगभग 5 करोड़ 83 हजार करोड़ की। इसमें भी पिछले वर्ष की तुलना में 58 हजार की बढोत्तरी होगी। इन सबको जोड़ दिया जाए तो सरकार की कमाई हो जाती है लगभग 48 लाख करोड़।
टैक्स से होने वाली कमाई को खर्च करने को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं कि पैसा पहले किस पर खर्च किया जाय। जनता कहती है हम पर सरकार कहती है हम पर। अब चूंकि तय सरकार को करना है तो उसने तय कर लिया कि पहला खर्चा हम अपने ऊपर करेंगे। इसलिए सरकार ने अपने सेंट्रल खर्चे में पिछली बार (37.5 लाख करोड़) की अपेक्षा 1 लाख 65 हजार 24 करोड़ बढाकर 39 लाख 24 हजार 154 करोड़ का कर लिया है। (इसमें इस्टेबलिसमेंट खर्च तकरीबन 3 लाख 51 हजार 945 करोड़ – सैलरी और भत्ते में सीधे तौर पर 5 हजार 972 करोड़ का इजाफा मतलब पिछले साल 1 लाख 59 हजार करोड़ की जगह 1 लाख 65 हजार 913 करोड़, दूसरे स्थापना खर्च भी लगभग 1 लाख 86 हजार 32 करोड़ कर दिए गए हैं) मतलब 50 लाख करोड़ के बजट में केन्द्र की स्थापना पर खर्च 39 लाख करोड़।
अब बचते हैं 11 लाख करोड़ के आस पास, इसके भीतर का खेल और भी निराला है। एग्रीकल्चर का खर्चा पिछले साल की तुलना में 3 हजार 818 करोड़ कम कर दिए गए। जो पिछली बार 1 लाख 31 हजार करोड़ था इस बार उसे 1 लाख 27 हजार 990 करोड़ कर दिया गया है। खाद (फर्टिलाइजर) में दी जाने वाली सब्सिडी में एक झटके में 22 हजार 692 करोड़ कम कर दिए गए। पिछली बार 1 लाख 80 हजार करोड़ के आसपास दिया गया था जिसे इस बार घटाकर 1 लाख 56 हजार करोड़ के करीब कर दिया गया है। पब्लिक सैक्टर जिसे सरकार बेचने पर तुली हुई दिखती है उस पर भी खर्च करने को तबज्जो नहीं दी जा रही है। यहां भी सरकार ने पिछली राशि 5 लाख 50 हजार करोड़ पर कैंची चलाते हुए उसे 5 लाख 35 हजार कर दिया है। सरकार के खर्च करने की प्राथमिकता में हैं शहरी इलाकों में घर बांटना (50 हजार 324 करोड़ बढाकर 96 लाख करोड़ जो पिछले साल थे 46 लाख करोड़), इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान, पीएम ग्रामीण आवास योजना आदि योजनाओं पर 5 लाख 41 हजार 850 करोड़ करने का लक्ष्य रखा है। केन्द्र सरकार की पालिटिकल स्कीम में राज्य सरकारों का भी योगदान होता है जो 40 – 60 या फिर 50 – 50 रेशियो पर चलती है। इसमें भी सरकार ने अपनी इमेज बनाये रखने के लिए 30 फीसदी का इजाफा किया है।
देश की पूरी इकोनॉमी में अगर प्रति व्यक्ति आय का आंकलन किया जाय तो हर व्यक्ति लखपति है मगर जैसे ही समुदाय विशेष और बहुसंख्यक के बीच में देखते हैं तो भारी फर्क दिखाई देने लगता है। देश के 17 राज्य तो ऐसे हैं जिनकी प्रति व्यक्ति आय 1 लाख तक भी नहीं पहुंच पाई है। चुनावी जंग जीतने के लिए जिस बिहार को सबसे ज्यादा योजनाओं से नवाजे जाने की कवायद की गई है उसकी हालत तो बद से बदतर है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय 55 – 60 हजार के बीच है। सरकार ने भीतर और बाहर से जो लोन ले रखा है उसका सूद चुकाने में ही सरकार के सिर पर तकरीबन 12 लाख 76 हजार 338 करोड़ का बोझ है। इसका मतलब तो यही है कि अपनी इकोनॉमी को ना सम्हाल पाने की स्थिति में किसी तरीके से राजनीतिक तौर पर देश की इकोनॉमी को चकाचौंध में दिखाने के लिए लोन लिया जाता है। मतलब सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है।
संसद के भीतर की कहानी जब बाहर आती है तो चुनावी रैलियों में तब्दील हो जाती है। क्योंकि देश में चुनाव बरस दर बरस होते ही रहते हैं। आज दिल्ली में है तो कल बिहार में होगा परसों बंगाल में होगा फिर असम, यूपी में होगा। सत्ता हड़पने के लिए सरकार पालिटिकल ऐलान राज्य दर राज्य करती चली जाती है। भले ही वो पूरे हों या ना हों। होने और ना होने के बीच वोट तो आ ही जायेंगे क्योंकि देश में वोटों का धुव्रीकरण तो रेवडियों के आसरे ही तो हो रहा है। सरकार भी इसमें कोई चूक करना नहीं चाहती। वह तो सरेआम कहती है कि हमने देश में लाभार्थियों की फौज खड़ी कर दी है। इसका मतलब तो यही हुआ कि भारत लाभार्थियों का देश बनकर रह गया है तथा अन्तरराष्ट्रीय तौर पर देश के नागरिकों को सबसे गरीब देशों की कतार में खड़ा करती है।
तो क्या सरकार डुगडुगी बजाकर कार्पोरेट और मिडिल क्लास के बीच मोटी लकीर खींचने में सफल हो गई है और इन सबके बीच जो लड़ाई एससी, एसटी, ओबीसी, संविधान, अम्बेडकर के आसरे चल रही है वो सब कुछ हवा हवाई है। तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से एक सवाल पूछना तो बनता है कि पिछले साल की तुलना में इस साल कितनी ज्यादा टैक्स बसूली करने वाली हैं (जो रियायत दे रही हैं उसकी तुलना में 5 गुना ज्यादा)। भारतीय रूपया तो अमरीकी डालर के चरणो में लगातार लोटते हुए रसातल की ओर गोते लगा ही रहा है और अब तो वह अब तक के सबसे निचले स्तर (87.29) पर पहुंच कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनके ही कहे शब्दों का आईना दिखाते हुए कह रहा है कि रूपया उसी देश का गिरता है जिस देश का प्रधानमंत्री गिरा हुआ होता है (आसमान में थूका गया थूक आज खुद के ऊपर ही गिर रहा है)।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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