खरी खरी : बीजेपी की कमाई – मोदी की विदाई !
जैसे-जैसे कलैंडर के पन्ने पलटते हुए सितम्बर महीने को नजदीक ला रहे हैं वैसे-वैसे बीजेपी और संघ के अंदरखाने हलचल तेज होती जा रही है। सितम्बर का मतलब है नरेन्द्र मोदी का अपनी उम्र के 75 बसंत पूरे कर मोह माया से वैराग्य लेकर वानप्रस्थ की ओर गमन करने का समय। मगर जो नरेन्द्र मोदी से भलीभांति परिचित हैं उनकी माने तो नरेन्द्र मोदी अपनी अंतिम सांस तक पीएम की कुर्सी से चिपके रहने के लिए हर संभव प्रयास करने से चूकेंगे नहीं। जहां तक मोदी के विकल्प की बात करें तो बीजेपी में कुछ ही नेता हैं जो नरेन्द्र भाई का विकल्प हो सकते हैं। मगर उनमें भी दो नाम बीजेपी के क्षितिज पर तैर रहे हैं पहला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरा गुजरात से आने वाले केन्द्र में गृहमंत्री अमित शाह का । और मामला यहीं आकर फंस जाता है।
चर्चानुसार जहां योगी आदित्यनाथ संघ की पसंद हैं वहीं अमित शाह नरेन्द्र भाई की पसंद हैं। बीजेपी और संघ के भीतर से निकल कर आ रही खबरें बता रही हैं कि नरेन्द्र भाई किसी भी कीमत में योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने नहीं देंगे तो संघ भी अमित शाह को पीएम बनने नहीं देगा। योगी आदित्यनाथ की जगह एकबार फिर से केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपने की चर्चा जिस तर्ज पर शुरू हुई है वह तो यही बता रही है कि योगी आदित्यनाथ के दिन पूरे हो चुके हैं यानी उनको जितने दिन के लिए सीएम की कुर्सी पर बैठाया गया है वह पूरे हो चुके हैं। इसको कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि यूपी के बीजेपी विधायक हैं नंदकिशोर गुर्जर उन्होंने हाल ही में गाजियाबाद में फटा कुर्ता पहन कर प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कहा कि मैंने राम कथा की परमीशन ली फिर भी पुलिस ने कलश यात्रा रोकने की कोशिश की, महिलाओं से बदतमीजी की, उनके कलश गिर गये, टकराव करके पुलिस मेरी हत्या करना चाहती थी। चीफ सेक्रेटरी ने जादू टोना और तंत्र क्रिया करके महाराज जी (सीएम योगी) की बुध्दि को बांध दिया है। सीएम ऐसे नहीं थे। सब रो रहे हैं। प्रदेश की जनता दुखी है। यूपी में राम कथा नहीं कर सकते, बहन बेटियां लुट रही हैं फिर कैसा राम राज्य है। यूपी का चीफ सेक्रेटरी दुनिया का सबसे बड़ा भृष्ट अधिकारी है। अयोध्या की सारी जमीन अधिकारियों ने लूट ली। फर्जी एनकाउंटर में लोग मारे जा रहे हैं। 28 मार्च के बाद कथा करके लखनऊ आ रहा हूं। चीफ सेक्रेटरी से कह रहा हूं – मेरा सीना होगा तुम्हारी गोलियां कम पड़ जायेंगी। मेरे पास कुछ ऐसी फाइलें हैं जिन्हें सार्वजनिक कर दिया गया तो यूपी सरकार आजादी के बाद की सबसे भृष्ट सरकार साबित होगी। अधिकारी सीएम को गुमराह कर रहे हैं। गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर शाम 5 बजते ही शराब पी लेते हैं। सीएम को एक एक बात बताऊंगा।
नंदकिशोर गुर्जर के बयान से तीन बातें निकलकर आती है। पहली सत्ता पार्टी का विधायक भी सुरक्षित नहीं है उसकी भी हत्या की साजिश रची जा रही है। दूसरी सनातन के लिए सबसे बड़ा खतरा है यूपी सरकार (क्या उत्तर प्रदेश पाकिस्तान या सीरिया है?) और तीसरी हिन्दुओं के लिए सबसे बुरा दौर चल रहा है यूपी में। यूपी के ही एक दूसरे विधायक हैं श्याम प्रकाश वे कहते हैं कि हमारी दिली इच्छा है कि योगी आदित्यनाथ दिल्ली चले जायें और यूपी की कुर्सी केशव प्रसाद मौर्य सम्हालें। हम जो सोचते हैं वो पूरा भी होता है। विधायक द्वय सीएम योगी आदित्यनाथ की तारीफ कर रहे हैं या पुलिस कमिश्नर को आगे रखकर यूपी सरकार को नंगा करते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ को नाकारा, निकम्मा, निठल्ला, अयोग्य बता रहे हैं। वह योगी जो खुद को योगी होने का दंभ भरता है उस पर भी जादू – टोना – तंत्र – मंत्र का प्रहार कर उसकी बुध्दि को बांधा जा सकता है। सोचने वाली बात है कि जिस बीजेपी में गुजराती जोड़ी की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता उस बीजेपी के एक सूबे के विधायक अपनी ही सरकार को भारत की सबसे भृष्ट सरकार होने का दावा कर रहे हैं। मतलब साफ है कि विधायकों के कांधे का सहारा लेकर पीछे से वार कोई दूसरा कर रहा है।
योगी सरकार के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यहां पर विधायकों की कोई हैसियत या औकात नहीं है सरकार तो अधिकारी चला रहे हैं। राजनीतिक तौर पर विपक्ष जो आरोप लगाता चला आ रहा है उन आरोपों को सच होने की वकालत खुद बीजेपी के विधायक कर रहे हैं। यह दीगर बात है कि अपनी फजीहत से बचने के लिए विधायक गुर्जर की बात को अनुशासनहीनता के दायरे में लाकर शो काज नोटिस दिया गया है। फिलहाल न तो यूपी का चुनाव है न ही देश का, है तो केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नरेन्द्र मोदी की 75वीं वर्षगांठ का (छठवें महीने सितम्बर) ।
बीजेपी में प्रधानमंत्री की कुर्सी सम्हालने वालों में राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, वसुंधरा राजे सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता भी हैं लेकिन देखा जा रहा है कि संघ योगी आदित्यनाथ को तो मोदी मजबूरी में अमित शाह को पीएम की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। योगी हों या शाह दोनों के लिए यह स्वर्णिम अवसर होगा यानी अब नहीं तो कभी नहीं। यह भी कानाफूसी सुनने में आती है कि हुजूर आला को श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की कुर्सी पर बैठाया जा सकता है लेकिन हुजूर के चारित्रिक इतिहास के मद्देनजर तो यही लगता है कि वे मर्जी से पीएम की कुर्सी छोड़ने वाले नहीं हैं। क्योंकि एकनाथ शिंदे ने अपनी मर्जी से उध्व ठाकरे की शिवसेना को नहीं तोड़ा था न ही अजीत पवार ने अपने चच्चा शरद पवार की एनसीपी को दोफाँक किया था। अपनी – अपनी मूल पार्टी को छोड़ कर किसी भी नेता ने अपनी मर्जी से बीजेपी ज्वाइन नहीं की है। अब ये किसकी मर्जी से, किसकी नोंक पर हुआ है, कौन है वो स्वघोषित चाणक्य पूरा देश जानता है।
बीजेपी और संघ के भितरखाने शुरू हो चुकी उठापटक का रिजल्ट सितम्बर में पता चलेगा जब मर्जी से हो या जबरिया देश को नया प्रधानमंत्री मिलेगा। तब तक गुजरात जोड़ी के पास इतना समय तो है कि वह पीएम की कुर्सी के रास्ते आने वाले अवरोधों को निपटा सकें। पिछले 10 सालों से अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने का खेला ही तो देखने को मिला है चाहे वो वरिष्ठ रहे हों, या समकक्ष या कनिष्ठ। मजेदार तो यह है कि वसुंधरा से लेकर शिवराज को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए पर्ची भी इन्हीं लोगों के हाथ से निकलवाई गई। इतिहास गवाह है कि सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता है। अपने अपनों का ही गला काटने मौके की तलाश में रहते हैं (मुंह में राम बगल में छुरी)। तो क्या अपने ने ही (भले ही अपने नाम पर पार्टी कैंडीडेट को एक वोट दिलाने की औकात नहीं है!) पीएम की कुर्सी पर बैठने के लिए अपने को ही निपटाने की सुपारी ले ली है क्योंकि अगर चूक हुई तो ऐसा सुनहरा अवसर दुबारा नहीं मिलेगा।
भले ही संघ योगी को पसंद करता हो लेकिन यूपी सीएम योगी को साम्प्रदायिक सौहार्द पर विषवमन करते ही देखा गया है। उन्हें शायद ही कभी किसी ने आम आदमी की समस्याओं पर सच बोलते हुए सुना हो। कामेडियन कुणाल कामरा की हकीकत बयां करती कामेडी ने अपनी दाड़ी में तिनका छिपाये चोर के साथियों को इतना आहत कर दिया कि वे पिल पड़े लठ्ठ लेकर कामरा पर। योगी भी कहां पीछे रहने वाले, वे भी कहने लगे कि कुछ लोग देश का चीरहरण करना चाहते हैं (देश का चीर क्या होता है और उसका हरण कैसे होता है वे ही बता सकते हैं), अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर विभाजन की खाई को चौड़ा करना चाहते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी को जन्म सिद्ध अधिकार मान लिया गया है। अब कौन समझाये योगी को कि देश की धरती पर पहली सांस लेते ही भारतीय संविधान का आर्टिकल 19 अभिव्यक्ति की आजादी देता है।
अभिव्यक्ति की आजादी का एक नजारा हाल ही में यूपी से ही सामने आया है जहां कानपुर की उत्तर इकाई के बीजेपी अध्यक्ष सचिन गुप्ता ने हास्पिटल के हड्डी वार्ड में ही पार्टी का बैनर लगा कर पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक कर डाली और करे भी क्यों न। देश में जो भी विद्यमान है वह बीजेपी का है और जो बीजेपी का है वह नरेन्द्र मोदी का है क्योंकि वही तो देश हैं तभी न नरेन्द्र मोदी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही कह कर सलाखों के पीछे भेजा जाता है। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने कमाई करने का जो करिश्मा किया है वो आज तक दुनिया भर में न कोई पार्टी न ही कोई नेता कर सका है। 2024 के लोकसभा चुनाव के शुरू होते समय बीजेपी के खाते में 5921.8 करोड़ थे (ओपनिंग बैलेंस) चुनाव खत्म होने पर हो गये 10107.2 करोड़ (क्लोजिंग बैलेंस)। जहां चुनाव में खर्च होने के बाद क्लोजिंग बैलेंस कम होता है वहां बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस बढ़ गया। तो एक बार फिर बीजेपी पर उंगली उठाते हुए दिखाई देते हैं योगी आदित्यनाथ। जब वे कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में विदेशी पैसों का इस्तेमाल हुआ है। योगी दूसरों को एक्सपोज कर रहे हैं या मोदी सरकार को वस्त्रहीन कर रहे हैं। तो क्या 303 सांसदों वाली मोदी सरकार डमरू बजा रही थी जब देश में विदेशी पैसों से चुनाव लड़ जा रहा था। देशवासियों ने तो बेरोजगारी, मंहगाई, सुरक्षा, शांति, सौहार्द की बात करना ही छोड़ दिया है बीजेपी से।
अंतिम छोर पर विराजे अति गरीब मेम्बरान
बेरोजगारी, मंहगाई, भुखमरी से जूझ रहे (अति गरीब) लोकसभा और राज्यसभा के मेम्बरानों की मदद करने के लिए मोदी सरकार द्वारा उनके वेतन-भत्ते में 7 साल (2018) में दूसरी बार मामूली बढोत्तरी (24 फीसदी) कर दी गई है। वह भी 1 अप्रैल 2023 से। जिसकी भरपाई देश की 140 करोड़ रईस जनता अपने परिजनों के पेट में पत्थर बांध कर टैक्स के रूप में करेगी। अब गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले मेम्बरानों को 1 लाख 24 हजार रुपये हर माह मिलेंगे। इतना भर नहीं भत्ते के रूप में मिलने वाली नगदी भी बढा दी गई है। साथ ही बिजली, पानी, लग्ज़री यात्रा (हवाई-रेल-सड़क), रहना खाना – पीना, संतरी फ्री। वैसे ये सब आम आदमी के जीवन को आसान (समस्याओं से निजात दिलाने के लिए) करने के लिए दिया जाता है मगर बेचारे अपना और अपने परिवार का जीवन आसान करने में इतने उलझ जाते हैं कि आम आदमी पर नजर ही नहीं जाती सिवाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, धार्मिक उन्माद फैलाने के। पेंशन में भी दरियादिली से बढोत्तरी की गई है ।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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