इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के न्यूज़लेटर में RSS पर गंभीर आरोप, संविधान और लोकतंत्र को लेकर उठाए सवाल
इंडियन ओवरसीज कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय न्यूज़लेटर के जनवरी 2026 अंक में प्रकाशित एक लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा और नीतियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। लेख में RSS पर भारत में फासीवाद, नस्लीय श्रेष्ठता और मनुवादी सोच को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है तथा इसे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताया गया है।
लेख में कहा गया है कि 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने देश को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद कई दशकों तक लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त किया गया, जिससे भारत का लोकतंत्र मजबूत बना रहा। हालांकि, लेख के अनुसार, उदार लोकतंत्र स्वभाव से नाज़ुक होते हैं और कई देशों में यह देखा गया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से चुनी गई सरकारें बाद में उसी लोकतंत्र को कमजोर कर देती हैं।
लेख में वर्ष 2014 को एक निर्णायक मोड़ बताते हुए कहा गया है कि उस वर्ष भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद, RSS की विचारधारा का प्रभाव शासन व्यवस्था पर बढ़ता गया। लेखक का दावा है कि RSS की वैचारिक जड़ें अति-राष्ट्रवाद, एकदलीय शासन और नस्लीय शुद्धता जैसे विचारों से जुड़ी रही हैं, जिनका संबंध यूरोप के फासीवादी और नाज़ी सिद्धांतों से बताया गया है।
न्यूज़लेटर में RSS के संस्थापक और प्रारंभिक नेताओं—केशव बलिराम हेडगेवार, बी.एस. मूंजे और एम.एस. गोलवलकर—के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वे धर्मनिरपेक्ष और समावेशी भारत की अवधारणा के विरोधी थे। लेख में यह भी उल्लेख है कि RSS के वैचारिक स्रोतों में मनुस्मृति को प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है, जिसे जाति और लिंग आधारित भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ग्रंथ बताया गया है।
लेख के अनुसार, मनुस्मृति की सामाजिक व्यवस्था संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। इसमें कथित तौर पर निचली जातियों और महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने की अवधारणाओं का समर्थन किया गया है। लेखक का कहना है कि RSS और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा परोक्ष रूप से इन विचारों को बढ़ावा देती रही है, हालांकि हाल के वर्षों में सार्वजनिक बयानबाजी में कुछ नरमी दिखाई दी है।
लेख में RSS से जुड़े एक नेता के पूर्व बयानों का हवाला देते हुए यह भी आरोप लगाया गया है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले वक्तव्यों पर न केवल कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि संबंधित नेताओं को संगठनात्मक स्तर पर प्रोत्साहन मिला। इसे कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों के लिए चिंताजनक बताया गया है।
पिछले एक दशक के राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिप्पणी करते हुए लेख में कहा गया है कि अल्पसंख्यकों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों के खिलाफ अपराधों में वृद्धि, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवाल और जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग से भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुंचा है।
न्यूज़लेटर में प्रकाशित यह लेख भारत के लोकतंत्र और संविधान के भविष्य को लेकर गंभीर बहस की आवश्यकता पर जोर देता है।
— रिपोर्ट
(लेखक: राजीव शर्मा, चंडीगढ़ कांग्रेस)





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