ज्ञान, स्क्रीन और संवेदना का संकट
“ज्ञान बढ़ा पर भाव क्या, अब भी मन लाचार”—यह पंक्ति केवल एक दोहा नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी के मनुष्य की सामूहिक आत्मस्वीकृति है। हमने जितना ज्ञान अर्जित किया है, उतना शायद मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में नहीं किया गया। सूचनाएँ उँगलियों पर नाच रही हैं, दुनिया एक छोटे से स्क्रीन में सिमट आई […]

