सम्मान, सम्मेलन और कविता का खोता जन-सरोकार
(जब कविता मंचों में सिमट जाए, जन-सरोकार पीछे छूट जाएँ और आत्ममुग्धता के बंद वृत्त में कवियों का लोकतंत्र तमगों व सर्टिफ़िकेटों में बदल जाए।) – डॉ. सत्यवान सौरभ कविता समाज की सामूहिक चेतना की आवाज़ होती है। वह समय का दस्तावेज़ भी है और समय से टकराने का साहस भी। लेकिन आज जब हम […]

