आस्था बनाम साँसें: कबूतर, कानून और हमारी सामूहिक गैर-जिम्मेदारी
— डॉ. सत्यवान सौरभ भारत में आस्था अक्सर तर्क से बड़ी हो जाती है। यही कारण है कि यहाँ मंदिर के बाहर घंटियों की आवाज़ से ज़्यादा तेज़ कभी-कभी साँसों की घुटन होती है, लेकिन हम सुनना नहीं चाहते। मुंबई की एक अदालत का हालिया फैसला—जिसमें सार्वजनिक स्थान पर कबूतरों को दाना डालने पर ₹5000 […]

