हर मोबाइलधारी पत्रकार तो नहीं! Reel बनाना और रिपोर्टिंग करना क्या एक ही बात है?
सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स की पहचान पर बहस, CJI सूर्यकांत बोले—हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो दूसरों के लिए मुश्किलें खड़ी होंगी
मोबाइल कैमरा, सोशल मीडिया और वायरल रील्स के दौर में अब घटनाओं को दुनिया तक पहुंचाना पहले से कहीं आसान हो गया है। लेकिन क्या किसी घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने वाला हर व्यक्ति पत्रकार कहलाएगा? क्या रील बनाने और पेशेवर पत्रकारिता करने के अधिकार व जिम्मेदारियां एक जैसी हो सकती हैं? इसी सवाल ने सुप्रीम कोर्ट में नई बहस छेड़ दी है।
15 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स की पहचान तथा उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। CJP प्रदर्शन के दौरान रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस के व्यवहार को लेकर उठे सवालों के बीच अदालत ने पत्रकारिता की परिभाषा और उसकी सीमाओं पर विचार करने की जरूरत जताई।
मोबाइल उठाया, कैमरा चलाया और बन गए पत्रकार?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान तय करने की चुनौती की ओर ध्यान दिलाया। उनका तर्क था कि आज मोबाइल फोन रखने वाला व्यक्ति भी खुद को स्वतंत्र पत्रकार बताने लगता है। ऐसे में पेशेवर पत्रकारिता, व्यक्तिगत विचार और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता या कमाई के लिए बनाए जाने वाले कंटेंट के बीच अंतर करना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि हर व्यक्ति पत्रकार बनने लगे, तो इससे दूसरों के लिए समस्याएं पैदा हो सकती हैं। वहीं, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने इस सवाल की विस्तार से जांच की आवश्यकता जताई कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में पत्रकारिता की भूमिका और पहचान को किस तरह समझा जाए।
हालांकि, अदालत की ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान सामने आए विचार हैं, इन्हें पत्रकार बनने के अधिकार पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
स्वतंत्र पत्रकारों की सुरक्षा भी अहम मुद्दा
मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों को कथित तौर पर पेश आने वाली बाधाओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने पुलिस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत बताई, ताकि पत्रकारों को अपना पेशेवर काम करने में अनावश्यक रुकावटों का सामना न करना पड़े।
इस बहस का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर मिलने वाली किसी विशेष सुविधा या संरक्षण के दुरुपयोग की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत के सामने चुनौती दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाने की है।
संविधान देता है बोलने की आजादी, लेकिन पहचान का सवाल अलग
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इसी अधिकार के तहत लोग अपनी बात रख सकते हैं, घटनाओं की जानकारी साझा कर सकते हैं और सार्वजनिक मुद्दों पर सवाल उठा सकते हैं। हालांकि, अनुच्छेद 19(2) के तहत इस स्वतंत्रता पर निर्धारित उचित प्रतिबंध भी लागू होते हैं।
भारत में स्वतंत्र रूप से लिखने, रिपोर्टिंग करने या सामग्री प्रकाशित करने के लिए सामान्य तौर पर किसी विशेष पत्रकार पंजीकरण की अनिवार्यता नहीं है। दूसरी ओर, सरकारी मान्यता और निर्धारित सुविधाओं के लिए अलग-अलग नियम हो सकते हैं। प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की मान्यता भी निर्धारित पात्रता और शर्तों के आधार पर दी जाती है। इसलिए PIB कार्ड न होना अपने आप में किसी व्यक्ति को पत्रकारिता करने से वंचित नहीं करता और कार्ड होना ही पत्रकारिता की पूरी परिभाषा नहीं है।
पत्रकारिता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट पहले भी मीडिया की जिम्मेदारी पर स्पष्ट रुख रख चुका है। निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ मामले में 11 दिसंबर 2018 के फैसले में अदालत ने दुष्कर्म पीड़िताओं की पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रकाशित करने पर रोक से जुड़े कानूनी प्रावधानों और रिपोर्टिंग में सावधानी की जरूरत को रेखांकित किया था। यह सिद्धांत डिजिटल और सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने वालों के लिए भी प्रासंगिक है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि कौन पत्रकार कहलाएगा, बल्कि यह भी है कि खबर देने वाला व्यक्ति तथ्यों की पुष्टि, पीड़ितों की निजता और कानून का कितना ध्यान रखता है। वायरल होने की होड़ में किसी घटना को एकतरफा या सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
अब निगाहें अदालत की आगे की कार्यवाही पर हैं। डिजिटल युग में हर नागरिक को अपनी आवाज उठाने का अधिकार है, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल कैमरा चलाने या वीडियो वायरल होने से तय नहीं होती। असली चुनौती यह है कि स्वतंत्र पत्रकारों की आवाज सुरक्षित रहे और पत्रकारिता के नाम पर मिलने वाले अधिकारों तथा संरक्षण की सीमाएं भी स्पष्ट हों।


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