12 साल की एकजुटता पर चुनावी ग्रहण! अग्रवाल समाज में प्रधानगी के लिए चार दावेदार मैदान में, अब सहमति नहीं सियासी जोड़तोड़ पर नजर
पंचकूला में सिलेक्शन की कोशिशों को झटका, नामांकन के आखिरी दिन चार उम्मीदवारों ने ठोकी ताल; 19 नवंबर तक नाम वापसी का मौका, पर्दे के पीछे मान-मनौव्वल की संभावना
पंचकूला। अग्रवाल समाज पंचकूला में जिस चुनाव को आपसी सहमति से टालने की कोशिश की जा रही थी, आखिरकार वही स्थिति बन गई, जिससे समाज के वरिष्ठ लोग बचना चाहते थे। प्रधान पद के लिए सर्वसम्मति से किसी एक नाम पर मुहर लगाने की कोशिशों के बीच गुरुवार को नामांकन के अंतिम दिन चार उम्मीदवारों ने अपनी दावेदारी पेश कर दी। इसके साथ ही फिलहाल सर्वसम्मति से प्रधान चुनने की संभावना को झटका लगा है और समाज में चुनावी मुकाबले की तस्वीर उभरने लगी है। अब चर्चा इस बात पर केंद्रित हो गई है कि क्या मैदान में उतरे उम्मीदवार अंत तक अपनी दावेदारी पर कायम रहेंगे या नाम वापसी की समयसीमा के दौरान कोई नया समीकरण बन जाएगा।
प्रधान पद के लिए चार लोगों के नामांकन ने यह साफ कर दिया है कि इस बार मुकाबला केवल किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपने तक सीमित नहीं रहने वाला। समाज के अन्य पदों के लिए भी अलग-अलग लोगों ने नामांकन दाखिल किए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनावी गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। हालांकि, अभी नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने में समय है और 19 नवंबर तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकते हैं। इसलिए अंतिम मुकाबले में कितने उम्मीदवार रहेंगे, इसका फैसला होना अभी बाकी है।
वरिष्ठों की समझाइश पर भारी पड़ी दावेदारों की महत्वाकांक्षा?
अग्रवाल समाज के वरिष्ठ सदस्य पिछले कई दिनों से इस प्रयास में जुटे थे कि प्रधान पद के लिए चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवार आपसी बातचीत से किसी एक नाम पर सहमत हो जाएं। उद्देश्य यह था कि समाज की कमान सर्वसम्मति से किसी व्यक्ति को सौंपी जाए और चुनाव के कारण सदस्यों के बीच किसी प्रकार की खींचतान पैदा न हो। वरिष्ठों की कोशिश थी कि सामाजिक संगठन में नेतृत्व का चयन आपसी विश्वास और सहमति के आधार पर हो, न कि मतों के बंटवारे के जरिए।
लेकिन नामांकन के अंतिम दिन चार उम्मीदवारों के सामने आने से इन कोशिशों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अब सवाल यह है कि क्या वरिष्ठ सदस्य एक बार फिर सभी दावेदारों को साथ बैठाकर किसी साझा नाम पर सहमति बना पाएंगे या फिर चुनाव कराना ही एकमात्र रास्ता बचेगा? फिलहाल तस्वीर यही संकेत दे रही है कि समाज में प्रधान पद को लेकर मुकाबले की जमीन तैयार हो चुकी है।
हालांकि, नामांकन दाखिल होना और अंतिम रूप से चुनाव लड़ना दो अलग-अलग बातें हैं। 19 नवंबर तक नाम वापस लेने की गुंजाइश होने के कारण बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों के बीच सहमति बनाने, समर्थन जुटाने और किसी संभावित समझौते को लेकर प्रयास हो सकते हैं। ऐसे में नाम वापसी की तारीख तक होने वाली गतिविधियां काफी अहम रहेंगी।
12 साल बाद चुनाव, पुरानी ख्वाहिशों को मिला मौका
पंचकूला के अग्रवाल समाज में करीब 12 साल बाद चुनाव होने जा रहे हैं। इतने लंबे अंतराल के बाद चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से प्रधान पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करने के इच्छुक लोगों को मौका मिला है। माना जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने की इच्छा रखने वाले कुछ लोगों ने इस बार अपनी दावेदारी सामने रखने का फैसला किया है।
लंबे समय तक चुनाव नहीं होने के बाद जब नेतृत्व चुनने की प्रक्रिया चुनावी रास्ते पर आगे बढ़ती है, तो दावेदारों की संख्या बढ़ना असामान्य नहीं है। हर उम्मीदवार अपनी योग्यता, अनुभव और समाज में अपने संपर्कों के आधार पर नेतृत्व की जिम्मेदारी हासिल करना चाहता है। लेकिन चुनौती यह है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और संगठन की सामूहिक एकजुटता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अग्रवाल समाज के सामने भी अब यही सवाल खड़ा है। चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और प्रत्येक उम्मीदवार को अपनी दावेदारी पेश करने का अधिकार है। दूसरी ओर, सामाजिक संगठनों में चुनाव के बाद भी सभी सदस्यों को एक साथ लेकर चलने की जिम्मेदारी बनी रहती है। ऐसे में मुकाबला केवल प्रधान की कुर्सी हासिल करने का नहीं, बल्कि समाज के भीतर विश्वास और एकजुटता बनाए रखने का भी होगा।
छह महीने पहले उठी थी बंटवारे की आशंका
करीब छह महीने पहले समाज के सदस्य प्रदीप गर्ग ने प्रधान पद के लिए चुनाव के बजाय सर्वसम्मति से चयन किए जाने की वकालत की थी। उनका तर्क था कि चुनाव के जरिए प्रधान तो चुना जा सकता है, लेकिन मतदान के दौरान समाज के सदस्यों के बीच मतभेद पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। उनका मानना था कि चुनाव के बाद मन में पैदा होने वाली दूरी को खत्म करना आसान नहीं होता।
प्रदीप गर्ग की यह चिंता अब मौजूदा घटनाक्रम के बीच फिर चर्चा में है। प्रधान पद के लिए चार उम्मीदवारों के मैदान में आने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या चुनाव के बाद समाज के सभी सदस्य एक ही मंच पर सहजता से साथ खड़े हो पाएंगे? हालांकि, यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि चुनाव होने से अनिवार्य रूप से समाज में विभाजन पैदा होगा। यदि सभी उम्मीदवार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाए रखें और परिणाम के बाद निर्वाचित नेतृत्व को सहयोग दें, तो चुनाव संगठन को मजबूत करने का माध्यम भी बन सकता है।
फिर भी, सर्वसम्मति की कोशिशों के बीच चुनाव की नौबत आना वरिष्ठ सदस्यों के लिए एक चुनौती जरूर है। उन्हें अब केवल किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में सहमति बनाने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक और विवादरहित तरीके से आगे बढ़े।
अब 19 अक्टूबर तक चलेगा मान-मनौव्वल का दौर?
नामांकन प्रक्रिया के बाद अब सबकी निगाहें 19 नवंबर तक होने वाली गतिविधियों पर रहेंगी। इस अवधि में उम्मीदवारों के बीच बातचीत, समर्थन जुटाने और नाम वापस लेने को लेकर समीकरण बन सकते हैं। यदि किसी एक नाम पर सहमति बनती है, तो चुनावी मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यदि सभी दावेदार मैदान में डटे रहते हैं, तो समाज को प्रधान चुनने के लिए मतदान की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पर्दे के पीछे चलने वाली बातचीत किस नतीजे पर पहुंचेगी। इतना जरूर है कि नामांकन के अंतिम दिन चार दावेदारों के सामने आने से मुकाबला रोचक हो गया है। अब वरिष्ठों की भूमिका, उम्मीदवारों की सहमति और समाज के सदस्यों का रुख इस चुनाव की दिशा तय करेगा।
आखिरकार, अग्रवाल समाज के सामने असली चुनौती केवल नया प्रधान चुनना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा के बावजूद सामाजिक एकजुटता कायम रखी जा सकती है। सर्वसम्मति से चयन की कोशिशों के बावजूद यदि चुनाव होता है, तो उसकी सफलता का पैमाना केवल विजेता का नाम नहीं, बल्कि चुनाव के बाद समाज को एकजुट रखने की क्षमता भी होगी।



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