15 हजार की मासिक मानदेय पर उठे सवाल , मांगा दफ्तर और वार्ड फंड—बोले, छोटे काम के लिए भी अधिकारियों के चक्कर
₹500 रोज में 24 घंटे की ‘जनसेवा’! हरियाणा के पार्षद बोले—मजदूर हमसे ज्यादा कमा रहा, दर्द सुनने वाला कौन?
हरियाणा में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के बीच अब नगर निकायों के निर्वाचित पार्षदों की कम मानदेय को लेकर नाराजगी भी सामने आने लगी है। पार्षदों का कहना है कि जनता के बीच 24 घंटे उपलब्ध रहने के बावजूद उन्हें महज 15 हजार रुपये मासिक मानदेय मिलता है। यानी औसतन करीब 500 रुपये प्रतिदिन, जबकि दिहाड़ी मजदूर को इससे अधिक मजदूरी मिलने का दावा किया जा रहा है।
पार्षदों का कहना है कि उनका काम निर्धारित समय तक सीमित नहीं है। वार्ड की समस्याओं से लेकर देर रात तक आने वाली शिकायतों और आपात जरूरतों में भी उन्हें जनता के बीच पहुंचना पड़ता है। इसके बावजूद न तो पर्याप्त मानदेय है और न ही काम करने के लिए बुनियादी सुविधाएं।
“कम से कम 50 हजार मानदेय तो होना चाहिए”
सत्तापक्ष के एक पार्षद ने कहा कि पार्षदों का मानदेय कम से कम 50 हजार रुपये प्रतिमाह किया जाना चाहिए। इसके साथ हर पार्षद को कार्यालय और आवश्यक स्टाफ उपलब्ध कराया जाए। उनका तर्क है कि विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों की तरह पार्षदों को भी अपने वार्ड के छोटे विकास कार्यों के लिए निश्चित फंड मिलना चाहिए।
पार्षदों की शिकायत है कि मामूली काम के लिए भी उन्हें अधिकारियों और टेंडर प्रक्रिया पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे जनता की समस्याओं के समाधान में देरी होती है।
ऑफिस तक नहीं, खर्चा जेब से!
कुछ पार्षदों का कहना है कि उनके पास बैठने के लिए अलग कार्यालय तक नहीं है और जनता की शिकायतें सुनने के लिए घर से काम चलाना पड़ता है। कार्यालय, स्टाफ और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं का खर्च भी कई बार उन्हें अपनी जेब से उठाना पड़ता है।
एक पार्षद ने नाराजगी जताते हुए कहा कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें एहसास हो रहा है कि यह जिम्मेदारी कितनी बड़ी है। उनके मुताबिक जनता की समस्याओं के लिए दिन-रात फोन आते हैं और कई बार रात में भी मौके पर जाना पड़ता है। ऐसे में “500 रुपये प्रतिदिन में 24 घंटे की जनसेवा” वाला सवाल अब पार्षदों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
पार्षदों का कहना है कि वे हड़ताल नहीं कर सकते, क्योंकि जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी सीधे जुड़ी है। ऐसे में सरकार को उनकी समस्याओं पर ध्यान देते हुए मानदेय, कार्यालय, स्टाफ और वार्ड फंड जैसी मांगों पर ठोस नीति बनानी चाहिए।




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!