खरी-अखरी : जेन जी को दस्तक की आवाज, उसकी धड़कनों को जिंदा रखना होगा बतौर एक चेतावनी उस सत्ता के लिए जो देश के भीतर डर और खौफ पैदा किए हुए है
2014 से दिल्ली के भीतर आंदोलन करने को गंभीर अपराध बनाकर रख दिया गया है। किसानों ने मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये तीन कानूनों को रद्द कराने के लिए जब आंदोलन किया तो उन्हें दिल्ली की सीमा में प्रवेश नहीं करने देने के लिए हर तरह के दमनात्मक उपाय किए गये। यहां तक कि दिल्ली की सीमाओं पर कीलें गाड़ दी गई, कंटीली तारें लगा दी गई। किसानों को आतंकवादी तक घोषित कर दिया गया। लेकिन किसान मोदी सरकार के हर जुल्मों सितम को सहते हुए भी सर्दी-गर्मी-बरसात को झेलते हुए दो साल तक आंदोलनरत रहा। आखिरकार किसानों के साहस के सामने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घुटने टेक कर माफी मांगते हुए उन तीनों काले कानूनों को रद्द करना पड़ा। लेकिन इसके बाद भी दमन नहीं रुका। किसानों के आंदोलन के पहले दिल्ली के भीतर नागरिक कानूनों को लेकर आंदोलन हुआ, जब आंदोलनकारियों द्वारा संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया जा रहा था तभी शाजिसन हिंसा करवा दी गई और दंगा भड़काने के नाम पर कई सारे युवाओं को संगीन धाराओं के तहत सलाखों के पीछे डाल दिया गया। जिसमें से कई तो आज भी बाहर नहीं आ पाए हैं।
2014 से दिल्ली सहित देशभर में अलग अलग मुद्दों को लेकर जितने भी आंदोलन हुए सत्ता ने उन सभी आंदोलनों को बर्बरतापूर्ण तरीके से उन्हें रौंद दिया। 2014 यानी नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली की सल्तनत संभालते ही देशभर में डर और खौफ का ऐसा माहौल बना दिया गया कि ना तो सत्ता के खिलाफ कोई आवाज सुनाई दी, ना ही कोई सत्ता से सवाल पूछता हुआ दिखाई दिया और अगर किसी ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने या सत्ता से सवाल पूछने की कोशिश की तो हर उस शख्स को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। यहां तक कि देश के भीतर विपक्ष की राजनीति को भी ईडी, सीबीआई जैसी जांच ऐजेंसियों के जरिए कटघरे में खड़ा कर दिया गया। हाल ही में अनिल अग्रवाल (वेदांता ग्रुप) ने अपने जायज हकों पर डाका डालने पर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए अदालत का रुख किया तो कंपनी पर ईडी ने किस तरह धावा बोला पूरे देश ने देखा है। जबकि अनिल अग्रवाल वही शख्स है जिसने चुनावी चंदे के तौर पर मोदी की बीजेपी को हजारों करोड़ रुपए दिए हैं फिर भी नमक हरामी करने में जरा भी झिझक नहीं दिखाई गई। इसी तरह अपने एक यार से यारी निभाने के लिए मोहम्मद दीपक की कंपनी को जबरिया कैसे हड़पाया गया, यह भी किसी की नजर से छुपा नहीं है। यानी कब कहां कैसे जांच ऐजेंसियां सत्ता के ईशारे पर सक्रिय होकर लोगों के कैरियर को चौपट करने लग जाएं कोई नहीं जानता है।
नवम्बर 2025 में दिल्ली के भीतर की जहरीली हवा याने प्रदूषण को लेकर जब युवा अपनी बात रखने सड़कों पर उतरे तो सरकार के ईशारे पर एक झटके में 22 युवाओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। नोएडा में मजदूरों को किस बर्बरता पूर्वक कुचला गया सबको पता है। दिसम्बर 2025 में मनरेगा संघर्ष मोर्चा ने दिल्ली के भीतर प्रदर्शन की अनुमति मांगी तो उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी। लेकिन सीजेआई सूर्य कांत की एक मौखिक टिप्पणी के जरिए इंटरनेट पर पैदा हुई काॅकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने लंदन से आकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना पहला जमीनी प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी तो बिना किसी ना नुकुर के सुबह 10 बजे से शाम 05 बजे तक प्रदर्शन करने की लिखित अनुमति दे दी, वह भी सीधे एयरपोर्ट पर जाकर। मोदी सरकार ने जिस तरह से अभिजीत दीपके को जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट करने की अनुमति दी उसने एक साथ कई सवालों को जन्म दे दिया है। क्या इस प्रोटेस्ट के पीछे खुद सरकार है ? क्या इस प्रोटेस्ट के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है ? प्रोटेस्ट करने की अनुमति अभिजीत दीपके की जगह किसी मोहम्मद असलम या मोहम्मद सलीम जैसे आदि नामधारी ने मांगी होती तो क्या मोदी सरकार उसे अनुमति दे देती ? क्योंकि वर्तमान में साम्प्रदायिकता भारत की राजनीति की बुनियाद बनकर उसका चेहरा बन चुकी है। जिसे एक विशेष विचारधारा के लोग प्रगतिशील राष्ट्रवाद बताने से चूकते नहीं हैं।
इन सबके बावजूद 40 डिक्री तापमान और उमस भरी गर्मी के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था की नंगी हकीकत एक कंकाल की तस्वीर के जरिए पेश की जिसे राष्ट्रीय मीडिया, यूट्यूबर के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी लाइव कव्हरेज किया गया। इस प्रदर्शन ने इस बात को उजागर करके रख दिया है कि मोदी सरकार के 12 साल शिक्षा के मामले में बर्बादी के साल हैं। शिक्षा जगत के भीतर मोदी सरकार का इतना ज्यादा डर और खौफ फैला हुआ है कि एक भी प्रिंसिपल के मुंह से चूं तक नहीं निकला जबकि वह जानता है कि उसके विद्यालय के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है। हो भी क्यों ना जब स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक धार्मिकता के आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिए एक ही विचारधारा के लोगों को तैनात किया गया है जो पढ़ाने से ज्यादा धार्मिक मैसेजेज फारवर्ड करने में लगे रहते हैं। शिक्षकों के अनेकों संगठन अलग अलग राजनीतिक दलों की प्रतिछाया बनकर मौजूद हैं लेकिन वे भी अपने आकाओं के ईशारे के बिना एक शब्द भी नहीं बोल सके। किसी के मुंह से नहीं निकला कि देश को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया गया है जहां पर पेपर चोरी, घूस, सिफारिश के जरिए डाॅक्टर, इंजीनियर बनाये जा रहे हैं, नौकरी दी जा रही है। हो सकता है शिक्षक संगठनों की बागडोर सम्हालने वाले भी इसी रास्ते चलकर आए हों।
हकीकत तो यह भी है कि जो ठीक से पत्रकारिता नहीं कर सके उनमें से कई पत्रकार पत्रकारिता के प्रोफेसर बने हुए हैं। राम ही जाने वे क्या पढ़ाते होंगे ? हां कुछ जरूर वाइस चांसलर बनने के जुगाड़ में लगे होंगे। क्योंकि इस समय सभी का टाइम जुगाड़ में ही कट रहा है। राज्यपालों ने भी तो युनिवर्सिटीज का चांसलर बनकर युनिवर्सिटीज को एक विशेष विचारधारा के तबेले में तब्दील ही किया है। भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इंटायर पालिटिकल सांइस के इकलौते डिग्रीधारी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सेकेंडरी स्कूल के छात्र यह कहते हुए चैलेंज कर रहे हैं कि आपका सिस्टम गलत है। भारतीय इतिहास में आज तक किसी प्रधानमंत्री को बच्चों से मात खाते हुए देखा नहीं गया है। बच्चे आगे आकर बोल रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ना तो बोल पा रहे हैं ना ही नजरें मिला पा रहे हैं। अभी तो सेकेंडरी स्कूल के बच्चे बोल रहे हैं, अगर स्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो कल को प्राइमरी स्कूल के बच्चे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हिसाब मांगेंगे।
नरेन्द्र मोदी और उनके सिपहसलार द्वारा फैलाये गए डर और खौफ का आलम यह है कि बड़ी बड़ी पार्टियों के सांसद, विधायक, कद्दावर नेता अपनी पार्टी छोड़ कर बेशर्मी ओढ़े हुए मोदी की बीजेपी में शामिल होते चले जा रहे हैं और स्ट्रीम मीडिया सीना चौड़ा कर यह बताने में जरा सा भी शर्म महसूस नहीं करता है कि मोदी-शाह जब चाहें किसी भी पार्टी के सांसद विधायक को खरीद सकते हैं। वही मीडिया जब सीजेपी सुप्रीमो से सवाल करता है कि आपको मोदी शाह से डर नहीं लगता है, मोदी शाह का आपको खौफ नहीं है तो उसका जवाब सुप्रीमो खुले मंच से यह कह कर देता है कि मुझे पता है कि मैं गिरफ्तार किया जा सकता हूं फिर भी मैं अपने संवैधानिक अधिकारों को नहीं छोड़ सकता हूं। मुझे मोदी – शाह की राजनीति से कोई डर नहीं लगता है। काॅकरोच जनता पार्टी ने तो बकायदा पोस्टर लहराकर गोदी मीडिया के नंगपने से काॅकरोचों को सतर्क करते हुए लिखा कि DEAR COCKROACHES, GODI MEDIA WILL TRY TO INTERACT WITH YOU AND SOMEHOW TRY TO FORCE YOU TO SAY CONTROVERSIAL THINGS FOR THEIR OWN BENEFIT TO MALIGN THIS MOVEMENT. STAY ALERT, PLAY SMART. यानी गोदी मीडिया अपने आकाओं को खुश करने और फायदे के लिए यह कोशिश जरूर करेगा कि एक भी विवादास्पद शब्द मिल जाए जिसे वह तिल का ताड़ बनाकर काॅकरोचों के प्रदर्शन को बदनाम कर सके। वैसे भी गोदी मीडिया काॅकरोचों के प्रोटेस्ट को देश विरोधी बताने से चूक नहीं रहा है। उसकी नजर में तो हर सरकार विरोधी आवाज राष्ट्र विरोधी होती है क्योंकि उसने मोदी सरकार को ही देश मान लिया है। इसीलिए जंतर-मंतर पर गोदी मीडिया विरोधी नारे भी गुंजायमान होते रहे। वैसे देखा जाए तो ये नारे गोदी मीडिया के एंकरों से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना है।
इसी कड़ी में हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को रखा जा सकता है जहां कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को लेकर कहा कि वे संविधान से ज्यादा सत्ताधारियों के वफादार हैं। UP police officers not loyal to Constitution, they act to satisfy political superiors. “The vertical loyalty of officers runs not toward the constitution but toward the ruling dispensation. Field officers, acutely conscious of the transfer posting economy. Calibrate their conduct to satisfy political superiors. ऐसा लगता है कि मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी जयचंद्रन ने तो अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ही आब्जर्वेशन से सुप्रीम कोर्ट को ही आईना दिखा दिया है। MADRAS HIGH COURT SET ASIDE ELECTION OF AIADMK’S INBADURAI IN 2016 POLLS, DECLARES DMK’S M APPAVU AS WINNER AFTER 10 YEARS. HIGH COURT OBSERVED : THE HON’BLE SUPREME COURT, AFTER KEEPING THE MATTER PENDING FOR ABOUT SIX YEARS THROUGH FIT THAT THE QUESTION HAS TO BE KEPT OPEN IN VIEW OF THE LAPSE OF TIME……………. IF COURTS CONTINUE TO IGNORE THEIR OWN OBSERVATIONS MADE IN MOHD. AKBAR CASE (CITED SUPRA), I FEAR THAT THIS COUNTRY MAY ALSO GO IN THE WAY OF OTHER AUTOCRATIC COUNTRIES WHICH GAINED INDEPENDENCE AROUND 75 YEARS AGO, ALONG WITH US………………
सबसे सोचनीय स्थिति उन छात्रों की है जो 12वीं की परीक्षा दे रहा है और पर भी उसे अनुकूल एज्युकेशन नहीं मिल पा रहा है, कंबांइड युनिवर्सिटीज के एक्जाम की परिस्थिति भी नाजुक हो जाती है, जब वह प्रोफेशनल दिशा में बढ़ना चाहता है तो वहां भी पेपर लीक हो जाता है यानी क्या यूपीएससी, क्या यूजीसी, क्या स्टेट सर्विस कमीशन सभी जगह परेशानी ही परेशानी है। हर कोई जानता है कि इस दौर में राजनीतिक सत्ता के पास भरपूर राजनीतिक ताकत है, संवैधानिक ताकत है, उसकी मुट्ठी में हर संवैधानिक संस्थान कैद है, वो जैसा चाहे वैसा कर सकती है, सत्ता और सरकार से सवाल पूछने वालों को कटघरे में खड़ा कर देती है, सारे इंस्टीटयूशन सत्तानुकूल हो चले हैं, जिसे कार्रवाई करना है वह कार्रवाई कर नहीं रहा है इसके बावजूद भी हजारों की संख्या में छात्र जंतर-मंतर पर पहुंचे। इसे बहुत बड़ी बात कह सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि काॅकरोच शब्द तो देश की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे चीफ जस्टिस ने कहे थे जिसे आत्मसात करते हुए काॅकरोच जनता पार्टी का गठन किया गया और वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने मन की बात कहने भी पहुंच गई तो कल को अगर यह मामला फिर से अदालतों (जनक) के गलियारों में चला गया तो क्या न्यायपालिका इन काॅकरोचों (छात्रों) का साथ देगी ? क्योंकि अगर नवजात की धड़कन रुक गई तो फिर कुछ बचेगा नहीं। शायद इसीलिए काॅकरोच जनता पार्टी सुप्रीमो अभिजीत दीपके ने खुले तौर पर कहा कि हर माँ के भीतर डर है कि मोदी सत्ता उसके पुत्र को सलाखों के पीछे डाल देगी लेकिन आखिर हम कब तक ऐसे डर से डरेंगे। अब समय आ गया है यह बताने का कि अब हम इनकी राजनीति से नहीं डरेंगे।
इसी जंतर-मंतर पर और इससे चंद फर्लांग की दूरी पर यानी रामलीला मैदान में 14 बरस पहले राजनीतिक करप्शन को खत्म करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति की मांग पर एक हुजूम जमा हुआ था। उससे उपजी एक राजनीतिक पार्टी ने क्या गुल खिलाये यह देश देख चुका है। सत्ता तो पलट गई लेकिन करप्शन खत्म होने के बजाय सिस्टम में तब्दील हो गया। मौजूदा राजनीतिक सत्ता हर तरह के करप्टों के तबेले में कन्वर्ट हो चुकी है। मगर इस बार तो सवाल उनका है जो 15 से 30 के आयु वर्ग के बीच खड़े हैं। वह देश के भीतर एज्युकेशन सिस्टम को कोलेप्स होते हुए देख रहा है। अपने भविष्य को कोलेप्स होते हुए देख रहा है। वह ऐसे दोराहे पर खुद को खड़ा हुआ देख रहा है जहां एक ओर सत्ता कैरियर पर संकट पैदा कर रही है तो दूसरी ओर उसी सत्ता के डर और खौफ का साया है जो उसे निगल जाना चाहता है। शायद इसीलिए “डर के आगे जीत है” इस स्लोगन को ध्यान में रखकर ही काॅकरोच जान हथेली पर रख कर सामने आया है। यह सोच कर कि रोज रोज छुपकर मरने से बेहतर है एकबार सामने आकर शहीद हो जाना।
पहली बार पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन का एक चेहरा सोशल ट्रांसफार्मेशन और देश के उस एज्युकेशन सिस्टम से जुड़ रहा है जिसके हर कोने में करप्शन अपनी पैठ बना चुका है। लगता है देश की राजनीतिक सत्ता को देश के भीतर एज्जुकेटेड लोगों की जरूरत ही नहीं है। यह सच है कि संविधान हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी देता है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मौजूदा दौर में मौजूद सत्ता ने उसी अभिव्यक्ति की आजादी को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर छीन लिया है। इस दौर में कोई भी पालिटीशियन सड़क पर उतरना नहीं चाहता है। सत्ता का हो या विपक्ष का हर नेता राजनीतिक तौर पर खुद को सुरक्षित रखने की जुगत में लगा हुआ है क्योंकि हर कोई भृष्टाचार के हमाम में नंगा खड़ा है और उसकी फाइल पीएमओ के पास है। इसीलिए मौजूदा सत्ता ने करप्शन को ही सिस्टम में बदल दिया है। टेक्नोलॉजी का एक सिरा जहां लोकतंत्र की परिभाषा को बदलते हुए हड़प रहा है तो दूसरा सिरा लोकतंत्र की अलख जगाने के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार भी बनता हुआ दिख रहा है।
जंतर-मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट से पहला मैसेज तो यही निकल कर आया कि देश के भीतर डर और खौफ की वजह से जब हर किसी ने खामोशी बरती तब जेन जी ने पहली दस्तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर यह कहकर दे दी कि अभी नहीं तो कभी नहीं। दूसरा मैसेज देश के विपक्ष के लिए है कि यदि उसने अपने राजनीतिक हित साधने, अपनी सुरक्षा के लिए राजनीति को संभाल कर रखा हुआ है तो वह जान ले कि आने वाले समय में देश के राजनीतिक तौर तरीके बदल जायेंगे। मौजूदा राजनीतिक सत्ता जो यह मानकर चलती है कि वही सारे संवैधानिक संस्थानों की मालिक है, संविधान उसकी मुट्ठी में कैद है और वह कुछ भी कर सकती है तो धीरे-धीरे ही सही संविधान का पहला पन्ना पलट दिया गया है। यह तीसरा मैसेज है। चौथा मैसेज है देश की न्यायपालिका और चीफ जस्टिस संविधान के संरक्षक होने के नाते जिस तरीके से संविधान की परिभाषा गढ़ते हैं, व्याख्या करते हैं तो वो जान और समझ लें कि जेन जी खड़ा होकर बतलाएगा कि संविधान में यह लिखा हुआ है और न्यायपालिका तथा चीफ जस्टिस को उसे सुनना पड़ेगा। आखिरी मैसेज खुद जेन जी के लिए है जो देश का लगभग 45-47 परसेंट है तथा 15 से 32 वर्ष तक के आयु वर्ग बीच में में जी रहे हैं। पढ़ाई करने के बाद भी उनके पास कोई काम नहीं है और देश की आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों में जब राजनीति गुम हो चुकी है तब जेन जी ने एक दस्तक दी है। उस दस्तक की आवाज, उसकी धड़कनों को जिंदा रखना होगा बतौर एक चेतावनी उस सत्ता के लिए जो देश के भीतर डर और खौफ पैदा किए हुए है।
जिनके आंगन में अमीरी का शजर लगता है, उनका हर ऐब जमाने को हुनर लगता है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


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