खरी-अखरी : कैसे कहें मोदी अब सम्हाले नहीं सम्हल रहा है देश
कैसे कहें मोदी अब सम्हाले नहीं सम्हल रहा है देश
संसद में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक की आड़ में परिसीमन विधेयक को पास कराने का मंसूबा धराशाई हो जाने के बाद जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्र के नाम संदेश देने दूरदर्शन पर सामने आये थे तो लोगों को लगा था कि वह वैश्विक इकाॅनामिक क्राइसिस से प्रभावित हो रहे अपने देश को लेकर कुछ बोलेंगे लेकिन नहीं वो तो अपने विशेषाधिकार का दुरुपयोग करते हुए पूरे टाइम विपक्ष को कोसते रहे। उनका पूरा उद्बोधन किसी भी कोने से राष्ट्र के नाम संदेश ना होकर पांच राज्यों में हो रहे चुनाव को साधने के लिए विशुद्ध रूप से राजनीतिक भाषण रहा। पांच राज्यों के चुनाव हो गए और प्रधानमंत्री की पहली प्राथमिकता पश्चिम बंगाल बीजेपी जीत गई। उसके बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब प्रधानमंत्री एकबार फिर दूरदर्शन पर आकर देश के सामने सुरसा की तरह मुंह बाये खड़े दयनीय आर्थिक हालात पर देश के सामने अपनी बात रखेंगे लेकिन नहीं वो भारत ही नहीं दुनिया के इकलौते ऐसे नेता हैं जो तीन सौ पैंसठ दिन चौबीस घंटे चुनावी मूड में रहते हैं। तभी तो उन्होंने देश की गिरती हुई आर्थिक सेहत को लेकर एक राजनीतिक रैली में ठीक उसी प्रकार से बोला जैसा वो सभी चुनावी रैलियों में बोला करते हैं।
फिर भी जो उन्होंने बोला अगर उसकी शुरुआत कुछ इस तरह से करते कि देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए वे एक साल तक विदेश यात्राएं नहीं करेंगे। वे एक साल तक लग्जीरियश जिंदगी जीने के बजाय सादगी भरा जीवन जियेंगे। एक साल तक कोई भी अपने देशीय दौरों में गाडियों का रेला लेकर नहीं निकलेंगे। उनके अगले जितने भी कार्यक्रम होंगे वे सादगी भरे होंगे। वे खुद को सादगी भरे एक उत्कृष्ट माॅडल की तरह पेश करेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। उन्होंने तो सीधे तौर पर कहा कि आज जो संकट है उसमें विदेशी मुद्रा बचाने पर बहुत जोर देना होगा क्योंकि दुनिया में पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा मंहगा हो गया है यानी पहले की अपेक्षा कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई है। तो सबका दायित्व है कि पेट्रोल डीजल की खरीद पर जो विदेशी मुद्रा खर्च होती है उसको बचाने के लिए पेट्रोल डीजल का उपयोग कम से कम करें। आने वाले एक साल तक देश के भीतर का सफर कमतर कर दें। एक साल तक विदेश यात्रा ना करें। आगामी एक साल में सोना (गोल्ड) शादी ब्याह के मौके पर भी ना खरीदें। इतना ही नहीं उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि लोग अपने खाने में भी कम से कम खाद्य तेल का इस्तेमाल करें। यानी क्राइसिस वाकई बहुत गहरा है। मसला आम आदमी की रसोई से लेकर खेती तक जुड़ चुका है। मसला पेट्रोल डीजल से लेकर करेंसी से जुड़ चुका है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मामला डाॅलर से जुड़ा हुआ है और भारतीय करेंसी रूपया डाॅलर के सामने रोज नतमस्तक होता चला जा रहा है।
इस आर्थिक संकट की स्थिति एक दिन में नहीं आई है। देश के आर्थिक हालात तो 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमला किया था तब से ही शुरू हो गया था और उसको दयनीय करने में होर्मुज रूट बंद होने ने सोने पर सुहागा का काम किया है। लेकिन उस समय तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पूरी सरकार चुनाव की तमाम रैलियों में देश की आर्थिक स्थिति को एकदम ठीक बताते हुए मौसम को रंगीन बनाए हुए थे। जबकि हकीकत यह है कि जिस तरह से पूरी दुनिया आर्थिक संकट से गुजर रही है खास तौर से क्रूड आयल को लेकर भारत भी उससे अछूता नहीं था। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावों में बीजेपी की जीत को सुनिश्चित करने के लिए खामोशी बरती हुई थी। यानी देश के साथ खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा था। लेकिन जैसे ही चुनाव परिणाम आये पीएम मोदी राष्ट्र के नाम संदेश देने के बजाय दक्षिण भारत के अलग अलग राज्यों की रैली में कहने लग गए कि देश के भीतर की आर्थिक परिस्थिति बेहद नाजुक है। यानी तेल, खाद्य पदार्थ, फर्टिलाइजर, करेंसी सभी की हालत दयनीय है। इसलिए आप एक साल तक सोना मत खरीदिये, हर फंक्शन को सादगी से करिए, पेट्रोल डीजल के वाहनों से सफर कम से कम करिए, विदेश यात्राएं बंद कर दीजिए। मतलब देश के सामने इकाॅनामिक इमर्जेंसी वाले हालात आ चुके हैं।
एक सच यह भी है कि देश के भीतर जीरो एंप्लायमेंट है। कोई बड़ी फैक्ट्री, इंडस्ट्री, कंपनी खुली ही नहीं है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ ने खुले तौर पर कहा है कि भारत के भीतर जो ग्रेजुएट हैं उनको भी रोजगार नहीं मिल पा रहा है। अनआर्गनाइज्ड सेक्टर के भीतर बहुत ज्यादा क्राइसिस है। यानी एक लिहाज से रेड लाइन है। अगर इतनी भयावह स्थिति है तो फिर सरकार चुनाव में मशगूल होकर हसीन सपने क्यों दिखा रही थी ? और चुनाव के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की बदतर स्थिति का नक्शा दिखाते हुए कोविड काल की डरावनी तस्वीर का संजयी रूपांतरण करते चले गए। भारत के भीतर की एक हकीकत यह भी है कि आज की तारीख में अगर चीन से आने वाला कच्चा माल आना बंद हो जाए तो फिर मेक इन इंडिया जुमला बनकर रह जाएगा। भारत के भीतर हर इंडस्ट्री के शटर गिर जायेंगे। भारत का व्यापारिक घाटा लगातार बढ़ता चला जा रहा है। पिछले फाइनेंशियल ईयर की तुलना में इस वर्ष यानी जनवरी से अप्रैल के बीच यह आंकडा 200 परसेंट को पार कर रहा है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस विदेशी मुद्रा को बचाने जिक्र कर रहे हैं उसके आगे देशी मुद्रा दम तोड़ती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दक्षिण भारत के अलग अलग राज्यों में दिया गया भाषण सिर्फ भाषण नहीं है दरअसल यह आने वाले समय की एक ऐसी आहट है जो सवाल खड़ा करती है कि सरकार आर्थिक हालातों को सम्हालने की स्थिति में नहीं है। वह देश के सामने सुनहरा विजन दे पाने में असफल है। वे शायद देशवासियों से यही कह रहे हैं कि चुनाव खत्म हो गया है जितने सुनहरे सपने देखने थे आपने देख लिए हैं। अब संभल जाइए देश में इकाॅनामिक इमर्जेंसी की स्थिति आ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को भयानक और गहरी अंधेरी खाई को दिखाते हुए उसी मूड में चल रहे हैं जिस मूड में वह हर चुनाव को जीतने के मूड में रहते हैं। यही इस देश की त्रासदी और हकीकत भी है।
प्रधानमंत्री ने जिस तरह से देश को इमोशनली ब्लैकमेल करने के लिए देशभक्ति और राष्ट्रहित की चासनी में लपेट कर इकाॅनामिक संकट से उबरने के उपाय सुझाये हैं । बल्कि यहां तक जिक्र कर गये कि एक समय ऐसा भी आया था जब देशवासियों ने संकट या युध्द के समय सोना तक दान कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही 1965 का नाम नहीं लिया लेकिन नजीर 1965 की ही दे रहे थे। तब देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। जब उन्होंने जय जवान जय किसान का नारा देते हुए लोगों से एक दिन उपवास रखने का आव्हान किया था और पूरे देश ने उसका अनुसरण किया था क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्री की कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था। उन्होंने खुद परिवार सहित उपवास रखा। सादगी की प्रतिमूर्ति शास्त्री के पास केवल दो जोड़ी कपड़े थे। लेकिन आज जो प्रधानमंत्री देशवासियों से दैनिक रोजमर्रा की जरूरतों को छद्म देशभक्ति और राष्ट्रहित के नाम पर त्यागने का आव्हान कर रहा है वह खुद ऐशोआराम भरी लग्जीरियश जिंदगी जी रहा है। ऊपर से नीचे तक करोड़ों रुपयों के साजो सामान ले लदा रहता है। उसकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अन्तर है।
और वह अंतर चंद घंटों के भीतर ही तब दिखाई दे गया जब वह दक्षिण भारत के राज्य से पश्चिमी भारत के राज्य गुजरात में पहुंचता है और उसका दुनिया की सबसे मंहगी 21 लग्जीरियश गाड़ियों का काफिला तामझाम, चकाचौंध के साथ निकलता है। गुजरात की प्रशासनिक गाड़ियों का हिसाब किताब अलग है। देशवासियों को बताया जा रहा है देश में ना तेल के कुएं हैं ना ही सोने की खदाने हैं। फर्टिलाइजर भी खुद का नहीं है। खाने का तेल भी बाहर से आता है। यानी संकट नोट भर का नहीं प्रोडक्ट्स का भी है। इसलिए सोच समझ कर उपयोग कीजिए और वह खुद विदेश यात्राओं पर जा रहा है। दर्जनों लग्जीरियश गाड़ियों का काफिला प्रोटोकॉल के तहत लेकर घूम रहे हैं। जिस तरह से भारत के भीतर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दुनिया की सबसे महंगी लग्जीरियश गाड़ियों का काफिला जिस चकाचौंध के साथ निकलता है वैसा दुनिया में किसी भी देश के प्रधानमंत्री का नहीं निकलता है।
समय की मांग है कि पेट्रोल डीजल गैस का संयम के साथ उपयोग करें लेकिन जब खुद देश का प्रधानमंत्री अपने ऐशोआराम के लिए फिजूलखर्ची करे तो वह “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” नहीं कहा जाए तो फिर क्या कहा जाए ? आम आदमी को एक हजार की एलपीजी पांच हजार रुपये में मिल रही है। ब्लैक मार्केट रंगीन हो गया है। कामर्शियल एलपीजी की कीमत 1700 से बढ़ाकर 3200 रुपये कर दी गई है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। नरेन्द्र मोदी की सरकार पूरी रईसी के साथ चल रही है। उस रईसी भरे खर्च के दायरे में उज्ज्वला योजना, गरीब कल्याण अन्न योजना, मनरेगा, पीएम आवास योजना का खर्चा भी कोई मायने नहीं रखता है। अपनी रईसी का जिक्र सरकार खुद भी करती है लेकिन जब सरकार खुद कह रही है कि देश में इकाॅनामिक इमर्जेंसी जैसे हालात पैदा हो गये हैं तो फिर क्यों नहीं बंद कर दिया जाता है उन तमाम परिस्थितियों को ?
जरूरत महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री को याद करने की नहीं है। जरुरत नरेन्द्र मोदी को याद करने की है। जिन्हें देश ने भारी बहुमत दिया, सारी सुख सुविधाएं दी यहां तक कि संविधान तक थमा दिया। लेकिन उसका रिजल्ट क्या है ? हासलाई शून्य। हर चीज का संकट है। मोदी कालखंड ने बीते 12 सालों में देश को इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया गया है कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जनता से कहना पड़ रहा है क्या खरीदें क्या नहीं खरीदें। कहां जाएं कहां ना जाएं। सोना मत खरीदो। विदेश मत जाओ। पेट्रोल डीजल गैस का इस्तेमाल कम करो। खाद और खाने के तेल का उपयोग घटा दो। सही मायने में यह संदेश नहीं है यह तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की विफलता है। वे सरकार की रईसी पर बंदिश लगाने की कूबत नहीं रखते हैं। यह साफ तौर पर ईशारा कर रहा है कि अब देश नरेन्द्र मोदी से सम्हल नहीं रहा है। उनमें तनिक सा भी नैतिक बल नहीं है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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