सीमित संसार से असीमित कल्पना तक: बाल-पठन संस्कृति का संकट
एक समय ऐसा भी था, जब मुझे बाल-पत्रिकाओं के अस्तित्व की कोई जानकारी नहीं थी। यह जानना तो दूर, मुझे इस बात का आभास तक नहीं था कि विद्यालयी पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अतिरिक्त भी बच्चों के लिए विशेष रूप से कुछ लिखा-पढ़ा जाता है। हमारे लिए पढ़ना केवल स्कूल से जुड़ी एक बाध्यता थी—होमवर्क, परीक्षा और अंकों तक सीमित। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि हमारे घर में न तो नियमित रूप से समाचार-पत्र आता था और न ही कोई पत्रिका। पढ़ना हमारे जीवन की संस्कृति नहीं, बल्कि मजबूरी था।
फिर भी, यदि भीतर कहीं पढ़ने की रुचि ने जन्म लिया, तो उसका श्रेय पाठ्यपुस्तकों को नहीं, बल्कि कॉमिक्स को जाता है। बचपन में मैंने कॉमिक्स जी भरकर पढ़ीं। वे रंग-बिरंगे चित्र, छोटे-छोटे संवाद और घटनाओं की तेज़ गति मुझे एक ऐसी दुनिया में ले जाती थी, जहाँ कल्पना पर कोई रोक नहीं थी। पाठ्यक्रम की कहानियाँ और कविताएँ जहाँ अक्सर नैतिक उपदेशों में उलझी रहती थीं, वहीं कॉमिक्स सहजता से आनंद देती थीं। वे मुझे यह सिखाती थीं कि पढ़ना बोझ नहीं, उत्सव भी हो सकता है।
कॉमिक्स ने मेरे भीतर पाठक का पहला बीज बोया। उस समय यह समझ नहीं थी कि यह कोई साहित्यिक यात्रा है, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि पढ़ने की आदत का पहला द्वार वहीं से खुला। यह अनुभव अकेला नहीं है। असंख्य बच्चों के लिए कॉमिक्स, पहेलियाँ और चित्र-कथाएँ ही पढ़ने की दुनिया में प्रवेश का पहला माध्यम रही हैं।
मुझे आज भी हिसार रेलवे स्टेशन की वह घटना स्पष्ट रूप से याद है। प्लेटफॉर्म पर स्थित एक बड़े पुस्तक-स्टॉल पर मेरी नज़र ठहर गई थी। वहाँ सजी हुई सुंदर, चमकदार और आकर्षक किताबें—विशेषकर बच्चों के लिए—मेरे लिए किसी अजाने संसार का द्वार थीं। यह पहली बार था, जब मैंने किताबों को इतनी विविधता और भव्यता के साथ देखा। उस समय मैं उन्हें केवल देख पाया, खरीद नहीं सका, लेकिन वह दृश्य मेरे मन पर स्थायी रूप से अंकित हो गया।
वह क्षण मेरे जीवन का एक मौन मोड़ था। उस दिन मेरे हाथ खाली थे, पर मन में एक सवाल जन्म ले चुका था—क्या किताबें केवल स्कूल तक ही सीमित हैं? क्या पढ़ने की दुनिया इससे कहीं बड़ी नहीं हो सकती? शायद उसी दिन मेरे भीतर एक ऐसा पाठक जन्म ले चुका था, जिसे अभी अपनी भाषा, अपनी दिशा और अपना मंच मिलना बाकी था।
यहीं से “सीमित संसार से असीमित कल्पना” की यात्रा शुरू होती है। बचपन में हमारी दुनिया अक्सर उन्हीं कहानियों और कविताओं तक सीमित रहती है, जो पाठ्यपुस्तकों में दी जाती हैं। ये पाठ आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। वे ज्ञान तो देते हैं, पर कल्पना को पंख कम देते हैं। बाल-पत्रिकाएँ, बाल-साहित्य और रचनात्मक पठन इसी कमी को पूरा करते हैं। वे बच्चों को केवल अच्छा विद्यार्थी नहीं, संवेदनशील मनुष्य बनने की दिशा में ले जाते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि आज बाल-पठन संस्कृति निरंतर हाशिये पर जा रही है। जिन बाल-पत्रिकाओं ने कभी पीढ़ियों को भाषा, संवेदना और सामाजिक चेतना दी, वे या तो बंद हो चुकी हैं या सीमित दायरे में सिमट गई हैं। इसका एक बड़ा कारण बदलती जीवन-शैली और डिजिटल माध्यमों का बढ़ता प्रभुत्व है। मोबाइल, टैबलेट और सोशल मीडिया ने बच्चों के हाथों से किताबें छीन ली हैं।
यह कहना आसान है कि तकनीक ने पढ़ने की आदत खत्म कर दी, लेकिन सच यह है कि हमने स्वयं किताबों को बच्चों के जीवन से धीरे-धीरे बाहर कर दिया है। अभिभावक आज बच्चों को मोबाइल देना आसान समझते हैं, लेकिन किताब दिलाना अतिरिक्त मेहनत। स्कूल पाठ्यक्रम पूरा करने की जल्दी में रचनात्मक पठन को गैर-ज़रूरी मान लिया गया है। परिणामस्वरूप, बच्चों की कल्पना या तो पाठ्यक्रम की सीमाओं में कैद है या फिर डिजिटल शोर में खो चुकी है।
बाल-पठन संस्कृति किसी भी समाज की बौद्धिक और नैतिक नींव होती है। बाल-पत्रिकाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, वे भाषा गढ़ती हैं, प्रश्न पूछने की आदत डालती हैं और सामाजिक यथार्थ से परिचित कराती हैं। एक अच्छी बाल-कहानी बच्चे को यह सिखा सकती है कि वह दुनिया को कैसे देखे, दूसरों के दुःख को कैसे समझे और अपने विचार कैसे व्यक्त करे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बाल-साहित्य को फिर से गंभीरता से लें। इसे केवल “बच्चों की चीज़” कहकर हल्के में न लें। बाल-पत्रिकाओं और बाल-पुस्तकों को स्कूलों, पुस्तकालयों और घरों में पुनः स्थान देना होगा। शिक्षक, अभिभावक और नीति-निर्माता—सभी को यह समझना होगा कि पढ़ने की आदत बचपन में ही विकसित होती है।
सरकारी और निजी स्तर पर ऐसे प्रयास होने चाहिए, जिनसे बाल-पत्रिकाएँ सुलभ हों। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सार्वजनिक स्थानों पर पुस्तक-स्टॉल केवल सजावट न बनें, बल्कि बच्चों के लिए पहुँच योग्य बनें। हर बच्चा उस स्टॉल पर खड़ा होकर केवल देखने तक सीमित न रह जाए—यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज जब नई शिक्षा नीति रचनात्मकता और समग्र विकास की बात करती है, तब बाल-पठन संस्कृति को उसके केंद्र में रखना अनिवार्य है। पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ बाल-साहित्य को भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। क्योंकि पढ़ना केवल जानकारी अर्जित करना नहीं, बल्कि सोचने की कला सीखना है।
अंततः, यह स्वीकार करना होगा कि कभी-कभी एक किताब—जिसे बच्चा खरीद नहीं पाता—वही उसके जीवन की दिशा तय कर देती है। हिसार रेलवे स्टेशन का वह पुस्तक-स्टॉल आज भी मेरे भीतर जीवित है। वह मुझे बार-बार याद दिलाता है कि सीमित संसाधनों के बीच भी असीमित कल्पनाएँ जन्म ले सकती हैं—बस उन्हें सही समय पर सही किताब मिल जानी चाहिए।
-डॉ. सत्यवान सौरभ




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