पंचकूला में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान पत्रकारों से धक्का-मुक्की, प्रेस की स्वतंत्रता पर उठे सवाल
देश के संविधान के लागू होने की 77वीं वर्षगांठ पर मनाए गए गणतंत्र दिवस के अवसर पर पंचकूला में एक गंभीर और चिंताजनक घटना सामने आई। सेक्टर-5 स्थित परेड ग्राउंड में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह के दौरान ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा कर्मियों द्वारा पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार किया गया। यह पूरी घटना कैमरों में रिकॉर्ड हो गई, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों और उपलब्ध वीडियो फुटेज के अनुसार, समारोह के दौरान जब हरियाणा के राज्यपाल अशीम कुमार घोष ध्वजारोहण के लिए मंच पर उपस्थित थे, उसी समय विभिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकार कवरेज में जुटे हुए थे। इसी दौरान कुछ सुरक्षा कर्मी मौके पर पहुंचे और अमर उजाला के फोटोग्राफर बंटी तथा दैनिक भास्कर डिजिटल के एक पत्रकार विक्रम के साथ धक्का-मुक्की की गई। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें निर्धारित क्षेत्र से हटकर काफी दूर जाकर फोटो और वीडियो बनाने के निर्देश दिए, जिस पर विवाद और गरमा-गरमी की स्थिति उत्पन्न हो गई।
मामला यहीं नहीं रुका। अमर उजाला और दैनिक भास्कर के पत्रकारों के अलावा कई अन्य डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े पत्रकारों के साथ भी इसी प्रकार का व्यवहार किया गया। कई पत्रकारों ने आरोप लगाया कि कवरेज के दौरान बार-बार रोका गया, कैमरे नीचे करने को कहा गया और शारीरिक रूप से पीछे धकेला गया। यह पूरी घटना कई फोटोग्राफरों के कैमरों में रिकॉर्ड हुई है, जो अब सार्वजनिक हो चुकी है।
गौर करने वाली बात यह है कि यह सब कुछ उस समय हुआ जब मंच पर स्वयं हरियाणा के राज्यपाल के साथ पंचकूला के उपायुक्त सतपाल शर्मा, पुलिस आयुक्त सृष्टि गुप्ता, डीसीपी क्राइम मधुसूदन सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद थे। इसके बावजूद पत्रकारों के साथ हो रहे इस व्यवहार को रोकने के लिए मौके पर कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया।
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें स्वतंत्र पत्रकारिता भी शामिल है। गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर, जब संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की जाती है, उसी दिन पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार लोकतंत्र की भावना के विपरीत माना जा रहा है।
घटना के बाद पत्रकारों में गहरा रोष व्याप्त है। मौके पर मौजूद पत्रकारों ने आपसी चर्चा में यह निर्णय भी लिया कि विरोध स्वरूप कार्यक्रम की कवरेज रद्द की जाए। हालांकि, मंच पर राज्यपाल की उपस्थिति और कार्यक्रम की गरिमा को ध्यान में रखते हुए पत्रकारों ने संयम बरतते हुए कवरेज को पूरा किया।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी नीतियों, कार्यक्रमों और बयानों को जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मीडिया निभाता है। ऐसे में पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की न केवल उनकी गरिमा का हनन है, बल्कि यह सूचना के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी चोट है।
इस घटना के बाद जिला प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। पत्रकारों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार सुरक्षा कर्मियों और अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
एक कैमरामैन की आँखों देखी
अपनी पेशेवर जिम्मेदारी का हवाला देते हुए एक कैमरा पर्सन ने घटनास्थल की आंखों देखी स्थिति साझा की। उन्होंने बताया कि जब मीडिया कर्मी कार्यक्रम स्थल पर फोटोग्राफी कर रहे थे, तभी उन्हें निर्देश दिया गया कि वे ग्राउंड में घूमकर फोटोग्राफी न करें और यह आश्वासन दिया गया कि आवश्यक तस्वीरें बाद में उपलब्ध करा दी जाएंगी।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि फोटोग्राफरों को स्वतंत्र रूप से कवरेज करने की अनुमति नहीं है, तो उन्हें कार्यक्रम में आमंत्रित करने का औचित्य ही क्या है? यदि मीडिया को केवल पूर्व-निर्धारित सामग्री तक सीमित रखना है, तो फिर स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका कहां रह जाती है?
इसके अतिरिक्त यह जानकारी भी सामने आई है कि हर वर्ष की भांति इस बार भी मीडिया कर्मियों के लिए मंच के समीप कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी। किंतु यह पहली बार हुआ जब मीडिया प्रतिनिधियों को वहां से हटाकर नीचे बैठने के निर्देश दिए गए। यह व्यवहार मीडिया कर्मियों के सम्मान और गरिमा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
जबकि यह लगातार कहा जाता रहा है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और प्रहरी है। ऐसे में इस प्रकार का व्यवहार उस दावे के विपरीत प्रतीत होता है।
अब समय आ गया है कि प्रबुद्ध नागरिकों के साथ-साथ स्वयं पत्रकार समुदाय भी इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करे। आज यदि वर्ष 2026 में मीडिया को मंच से हटाकर किनारे बैठाया जा रहा है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि आने वाले वर्षों—2027 या 2028—में कहीं उनकी भूमिका और अधिकार और अधिक सीमित न कर दिए जाएं।
यदि ऐसा हुआ, तो जनता को वही तस्वीरें और वीडियो देखने को मिलेंगे, जिन्हें सत्ता पक्ष दिखाना चाहेगा। यह स्थिति स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए एक गंभीर चेतावनी है।




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