चांदी में बुलबुला या निवेश का सुनहरा मौका? 1980 जैसे बड़े क्रैश की आशंका ने बढ़ाई चिंता !
क्या 1 लाख रुपये की गिरावट संभव?
चांदी ने हाल के हफ्तों में जो रफ्तार पकड़ी है, उसने निवेशकों को हैरान भी किया है और सतर्क भी। वायदा बाजार से लेकर सर्राफा बाजार तक चांदी ने रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए हैं, लेकिन अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या यह तेजी टिकाऊ है या फिर बाजार एक बड़े करेक्शन की ओर बढ़ रहा है। कई विश्लेषक मौजूदा हालात की तुलना 1980 और 2011 जैसे दौर से कर रहे हैं, जब कीमतें शिखर पर पहुंचने के बाद तेज गिरावट का शिकार हुई थीं।
तेजी के आंकड़े ही खतरे का संकेत
बीते एक महीने में चांदी की कीमतों में करीब 50–55 फीसदी की उछाल देखी गई है। दिसंबर के मध्य में जहां दाम 2 लाख रुपये के आसपास थे, वहीं जनवरी के तीसरे हफ्ते में यह 3 लाख रुपये प्रति किलो के पार निकल चुके हैं। सिर्फ जनवरी महीने में ही कीमतों में 80 हजार रुपये से ज्यादा का इजाफा हो चुका है।
इतनी कम अवधि में इतनी तेज बढ़त को बाजार की भाषा में “ओवरहीटेड रैली” माना जाता है, जो अक्सर मुनाफावसूली और तेज गिरावट का रास्ता खोलती है।
ओवरवैल्यूएशन और ग्लोबल फैक्टर्स
कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा कीमतों में जोखिम बहुत ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी का भाव 90 डॉलर प्रति औंस के ऊपर बना हुआ है और 100 डॉलर का स्तर अब मनोवैज्ञानिक लक्ष्य बन चुका है। घरेलू बाजार में भी 3.25–3.30 लाख रुपये का जोन अहम माना जा रहा है।
आलोचकों का कहना है कि अगर ये स्तर छू लिए गए, तो वहां से गिरावट का रास्ता खुल सकता है, क्योंकि मौजूदा कीमतों में पहले ही तमाम पॉजिटिव फैक्टर्स डिस्काउंट हो चुके हैं।
टैरिफ टेंशन खत्म हुई तो टूटेगा सहारा
हालिया तेजी के पीछे वैश्विक राजनीतिक तनाव और टैरिफ की आशंकाएं बड़ा कारण रही हैं। सुरक्षित निवेश के तौर पर निवेशक चांदी की ओर भागे। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, जैसे ही टैरिफ को लेकर नरमी के संकेत आएंगे, सेफ-हेवन की मांग कमजोर पड़ सकती है।
इतिहास गवाह है कि जब भी डर का माहौल कम होता है, तो चांदी जैसे एसेट्स में सबसे पहले मुनाफावसूली शुरू होती है।
डॉलर की वापसी से दबाव
डॉलर इंडेक्स में हालिया मजबूती भी चांदी के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। डॉलर मजबूत होने पर आमतौर पर मेटल्स पर दबाव आता है। अगर डॉलर में आगे और रिकवरी होती है, तो चांदी की चमक फीकी पड़ सकती है।
रिप्लेसमेंट थ्योरी और इंडस्ट्री का दबाव
चांदी की ऊंची कीमतें अब इंडस्ट्रियल डिमांड पर भी असर डालने लगी हैं। सोलर पैनल, ईवी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में निर्माता सस्ते विकल्पों की तलाश में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब कोई कच्चा माल जरूरत से ज्यादा महंगा हो जाता है, तो उद्योग उसका विकल्प ढूंढने लगता है।
इसका सीधा असर डिमांड पर पड़ता है और कीमतें टिक नहीं पातीं।
गोल्ड-सिल्वर रेश्यो ने बढ़ाई चेतावनी
गोल्ड-सिल्वर रेश्यो फिलहाल 14 साल के निचले स्तरों के करीब है, जो यह बताता है कि चांदी, सोने के मुकाबले काफी महंगी हो चुकी है। विश्लेषकों का कहना है कि यहां से रेश्यो का ऊपर जाना ज्यादा संभावित है, जिसका मतलब है कि या तो सोना और तेज भागे या फिर चांदी में गिरावट आए—और मौजूदा हालात में दूसरी संभावना ज्यादा मजबूत दिखती है।
इतिहास दोहराने का डर
1980 में चांदी ने रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद महज दो महीनों में 70 फीसदी तक की गिरावट दिखाई थी। 2011 में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला, जब कुछ महीनों में 30 फीसदी से ज्यादा का करेक्शन आया।
आज की स्थिति में भी तेजी बहुत तेज और लगभग एकतरफा रही है, जो इतिहास से मिलती-जुलती तस्वीर पेश करती है।
क्या 1 लाख रुपये की गिरावट संभव?
बाजार के कई दिग्गजों का मानना है कि अगर चांदी मौजूदा ऊंचे स्तरों से 25–30 फीसदी भी टूटती है, तो कीमतें सीधे 1 लाख रुपये प्रति किलो तक नीचे आ सकती हैं। यानी 3.20–3.30 लाख के जोन से गिरकर 2.30–2.40 लाख का स्तर भी असंभव नहीं है।
मौजूदा तेजी ने निवेशकों को भारी मुनाफा जरूर दिया है, लेकिन अब जोखिम उससे कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। आंकड़े, इतिहास और वैश्विक संकेत—तीनों मिलकर यह इशारा कर रहे हैं कि चांदी में बुलबुले जैसी स्थिति बन चुकी है।
सवाल सिर्फ इतना है कि गिरावट कब शुरू होगी, कितनी तेज होगी—और क्या निवेशक 1980 जैसा झटका झेलने के लिए तैयार हैं?





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