पहले ही साल अग्निपरीक्षा में नितिन नबीन, संगठन से लेकर चुनावी मोर्चे तक BJP की बड़ी कमजोरियां !
चुनावी गणित BJP के खिलाफ ?
भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर उम्र और अनुभव के संतुलन का नया प्रयोग किया है, लेकिन यह फैसला जितना साहसिक है, उतना ही जोखिम भरा भी। 45 वर्ष की उम्र में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान संभालने वाले नबीन के सामने पहला साल ही सबसे कठिन साबित होने जा रहा है। वजह साफ है—जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने हैं, वहां BJP की जमीनी पकड़ कमजोर है और सत्ता का रिकॉर्ड भी निराशाजनक रहा है।
केशव भुराड़िया
चुनावी गणित BJP के खिलाफ
आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। आंकड़े बताते हैं कि असम को छोड़ दिया जाए तो BJP इन राज्यों में अपने दम पर सरकार बनाने में अब तक नाकाम रही है।
पश्चिम बंगाल में लगातार प्रयासों के बावजूद पार्टी सत्ता से दूर है और संगठन अंदरूनी खींचतान से जूझ रहा है।
तमिलनाडु और केरल में BJP का वोट शेयर सीमित है और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बेहद मजबूत है।
पुडुचेरी जैसे छोटे राज्य में भी पार्टी स्थायी राजनीतिक आधार खड़ा नहीं कर पाई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन से इन राज्यों में राजनीतिक तस्वीर बदली जा सकती है?
सत्ता में लंबा समय, संगठन में थकान
BJP पिछले एक दशक से केंद्र की सत्ता में है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लंबे समय तक सत्ता में रहने से संगठन में जड़ता और जमीनी संपर्क कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। नितिन नबीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पार्टी को “चुनावी मशीन” से निकालकर फिर से कैडर आधारित संगठन बनाया जाए।
हालांकि वे “पंचायत से संसद तक” मजबूत उपस्थिति की बात कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कई राज्यों में पार्टी चुनावी मौसम में ही सक्रिय नजर आती है।
शाह–नड्डा की विरासत का दबाव
अमित शाह और जेपी नड्डा के कार्यकाल में BJP ने अभूतपूर्व विस्तार किया। चुनावी जीत, संगठन विस्तार और संसाधन प्रबंधन—तीनों मोर्चों पर पार्टी को मजबूती मिली। नितिन नबीन के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि इस ऊंचे मानक को बनाए रखने की भी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या नबीन अपनी अलग पहचान बना पाएंगे या वे सिर्फ अपने पूर्ववर्तियों की बनाई लकीर पर ही चलेंगे।
अनुभव है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा बाकी
बिहार की राजनीति में नितिन नबीन का रिकॉर्ड मजबूत रहा है—लगातार चार विधानसभा जीत, राज्य सरकार में अहम मंत्रालयों का अनुभव और संगठन में लंबी पारी। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति की चुनौती कहीं ज्यादा जटिल है। यहां सिर्फ प्रशासनिक अनुभव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं, सामाजिक समीकरणों और गठबंधन राजनीति की गहरी समझ भी जरूरी है।
रणनीति पर सवाल
नबीन ने चुनाव जीतने से ज्यादा “लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ने” की बात कही है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह बयान अच्छी मंशा दिखाता है, ठोस रणनीति नहीं। जब विपक्ष आक्रामक है और क्षेत्रीय दल मजबूत हैं, तब सिर्फ विचारधारा और संगठनात्मक भाषण काफी नहीं होंगे।
नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना BJP के लिए नई शुरुआत जरूर है, लेकिन यह शुरुआत आसान नहीं है। पहले ही साल कई राज्यों में चुनाव, संगठन की थकान, और शाह–नड्डा की भारी विरासत—ये सभी चुनौतियां मिलकर उनकी असली परीक्षा लेंगी।
अब देखना यह होगा कि क्या BJP का यह युवा प्रयोग पार्टी को नई ऊर्जा देगा या फिर यह साबित करेगा कि उम्र से ज्यादा अनुभव और जमीन की पकड़ राजनीति में निर्णायक होती है।




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!