पत्रकार, मीडिया हाउस और सोशल मीडिया का यथार्थ सच
बिना सरकारी या राजनीतिक सहारे के बिना क्यों नहीं टिक पाती पत्रकारिता ?
निष्पक्ष पत्रकारिता की तो चाह पर कभी सोचिए पत्रकार को हमने क्या दिया ?
डिजिटल युग में पत्रकारिता का चेहरा तेजी से बदला है। सोशल मीडिया और यूट्यूब के उभार ने यह भ्रम जरूर पैदा किया कि अब पत्रकार किसी बड़े मीडिया हाउस पर निर्भर नहीं रहेगा। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल और कड़वी है। आज एक नया ट्रेंड साफ दिखता है—जो पत्रकार किसी बड़े बैनर से अलग होता है, वह विकल्प के तौर पर अपना यूट्यूब चैनल शुरू करता है और दावा करता है कि अब वह “कुछ अलग” करेगा। सवाल यह है कि क्या यह अलग सच में संभव है, या यह सिर्फ पत्रकारिता में बने रहने की मजबूरी भर है?
यूट्यूब: आज़ादी का मंच या आर्थिक भ्रम
यूट्यूब ने अभिव्यक्ति की आज़ादी जरूर दी है, लेकिन यह आज़ादी आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं बन पाई। हकीकत यह है कि केवल यूट्यूब की कमाई के भरोसे लंबे समय तक पत्रकारिता करना बेहद मुश्किल है। भारत में अधिकांश दर्शक मुफ्त कंटेंट के आदी हैं। गंभीर, खोजी या नीति आधारित पत्रकारिता को अपेक्षित व्यूज नहीं मिलते, जबकि मनोरंजन या उत्तेजक कंटेंट जल्दी वायरल होता है। इसका सीधा असर विज्ञापन और रेवेन्यू पर पड़ता है।
एक प्रोफेशनल यूट्यूब न्यूज़ चैनल चलाने के लिए सिर्फ एक कैमरा और माइक काफी नहीं होता। एडिटर, ग्राफिक्स, रिसर्च, फील्ड रिपोर्टिंग, टेक्निकल स्टाफ और ऑफिस खर्च—ये सभी मिलकर एक भारी लागत बनाते हैं। शुरुआती दौर में कुछ बड़े पत्रकारों को पुराने संपर्कों के चलते विज्ञापन मिल भी जाते हैं, लेकिन समय के साथ ये स्रोत सूखने लगते हैं। तब चैनल चलाना संघर्ष में बदल जाता है।
बड़े नाम पर सीमित पहुंच
यह भी एक तथ्य है कि बड़े मीडिया हाउस छोड़कर अपने प्लेटफॉर्म बनाने वाले कई चर्चित पत्रकार धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। उनके कंटेंट की विश्वसनीयता और गंभीरता पर सवाल नहीं थे, सवाल था टिकाऊ मॉडल का। दर्शकों का बड़ा वर्ग आज भी टीवी या बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म से ही खबरें लेता है। स्वतंत्र मंचों की पहुंच सीमित रह जाती है, चाहे पत्रकार कितना ही बड़ा नाम क्यों न हो।
अब कुछ और वरिष्ठ पत्रकार नए प्रयोग की तैयारी में हैं। उन्हें शुभकामनाएं दी जानी चाहिए, लेकिन यह भी समझना होगा कि समस्या व्यक्ति की नहीं, संरचना की है।
सरकारी विज्ञापन और मजबूरी की पत्रकारिता
आज छोटे-बड़े अधिकांश मीडिया हाउस सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं। यह एक असहज सच्चाई है। सरकारी विज्ञापन ही कई संस्थानों के लिए जीवनरेखा बन चुका है। इसके बदले सत्ता के प्रति नरम रुख, आलोचना में संयम और कई बार खुला समर्थन दिखता है। यह किसी एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि ज्यादातर सिस्टम की मजबूरी है।
जो मीडिया सत्ता से दूरी बनाता है, वह अक्सर आर्थिक संकट में चला जाता है। वहीं, जो विपक्षी दलों के करीब रहता है, उसे दूसरे सिरे से फंडिंग मिलती है। नतीजा यह कि निष्पक्षता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। हर कोई खुद को स्वतंत्र बताता है और दूसरे को “गोदी मीडिया” कहता है, लेकिन असल में लगभग ज्यादातर मंच किसी न किसी सत्ता केंद्र पर निर्भर है।
संविधान और चौथे स्तंभ की अधूरी संरचना
विडंबना यह है कि संविधान ने प्रेस की स्वतंत्रता को अभिव्यक्ति की आज़ादी के रूप में तो मान्यता दी, लेकिन चौथे स्तंभ के लिए कोई आधारभूत आर्थिक या संस्थागत ढांचा विकसित नहीं किया। न पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा की ठोस व्यवस्था बनी, न स्वतंत्र मीडिया को संरक्षण देने वाला कोई मजबूत मॉडल। ऐसे में पत्रकारिता को “मिशन” कहकर पेश करना एक सुविधाजनक लेकिन खोखला तर्क बन गया है।
यह मान लेना कि पत्रकार के कोई खर्च नहीं होते, न परिवार होता है, न ऑफिस और न जीवन—दरअसल उस बेमानी सोच को उजागर करता है, जिसमें नैतिकता की बातें तो होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत से आंखें मूंद ली जाती हैं।
आज की पत्रकारिता एक कठिन दौर से गुजर रही है। यूट्यूब और सोशल मीडिया ने अवसर दिए हैं, लेकिन वे स्थायी समाधान नहीं बन पाए। जब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए मजबूत आर्थिक मॉडल, पारदर्शी विज्ञापन व्यवस्था और संस्थागत संरक्षण नहीं होगा, तब तक पत्रकार किसी न किसी सत्ता के सहारे खड़ा रहने को मजबूर रहेगा। सवाल यह नहीं है कि पत्रकार निष्पक्ष क्यों नहीं हैं, असली सवाल यह है कि क्या हमने उन्हें निष्पक्ष रहने लायक व्यवस्था दी है?




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