चंडीगढ़ की स्मार्ट-साइकिल योजना बुरी तरह फ्लॉप, 5000 साइकिलों में से अधिकतर कबाड़: जनता का पैसा हुआ बर्बाद
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर शुरू की गई चंडीगढ़ की पब्लिक बाइसाइकिल शेयरिंग योजना अब भारी विफलता के रूप में सामने आई है। स्मार्ट-बाइक कंपनी के साथ मिलकर प्रशासन ने शहर में 617 स्थानों पर 5000 स्मार्ट साइकिलें स्थापित कीं, लेकिन आज अधिकांश साइकिलें खराब, जर्जर या अनुपयोगी पड़ी हैं।
योजना के तहत 2020 से 2024 के बीच पांच चरणों में कुल 5000 साइकिलें खरीदी गईं —
पहले 250, उसके बाद 1250-1250 की तीन खेप और फिर अंतिम बैच में 1250 साइकिलें। इनका उद्देश्य शहर में प्रदूषण कम करना और छोटे-दूरी के सफर को आसान बनाना था।
लेकिन शुरुआत से ही प्रोजेक्ट कई चुनौतियों में फंसता गया। रिपोर्टों के अनुसार अगस्त 2024 तक 892 साइकिलें इस्तेमाल के लायक नहीं बचीं और 282 साइकिलें चोरी हो गईं। 2025 में स्थिति और बिगड़ गई—1500 साइकिलें रिपेयरिंग के लिए पड़ी थीं, जिनमें से लगभग 700 पूरी तरह कबाड़ घोषित की जा चुकी हैं।
तकनीकी बाधाएं भी बड़ी समस्या बनकर सामने आईं। ऐप-आधारित लॉकिंग सिस्टम इंटरनेट समस्या के कारण कई जगह नहीं खुलता, जिससे अनपढ़ या तकनीक से कम परिचित लोग इसका इस्तेमाल ही नहीं कर पाए। नेटवर्क फेल होने पर लोग घंटों तक साइकिल स्टेशन पर फंसे रहते थे।
फील्ड में नजर दौड़ाने से भी तस्वीर बदतर दिखती है। मनीमाजरा के शिवालिक गार्डन के पास लगे स्मार्ट-बाइक स्टेशन पर साइकिलें टूट-फूट कर बिखरी पड़ी हैं। न कंपनी ने उनकी सुध ली, न प्रशासन ने इनकी मेंटेनेंस सुनिश्चित की।
इस परियोजना पर जनता के टैक्स का करोड़ों रुपये खर्च हुआ, लेकिन परिणाम शून्य के बराबर रहा। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ये खरीद-फरोख्त बिना व्यापक योजना या जिम्मेदारी तय किए की गई, जिससे केवल कंपनी को फायदा हुआ और पब्लिक को नुकसान।
जानकारों का सुझाव है कि प्रशासन सभी नाकारा साइकिलों को तुरंत इकट्ठा कर नीलामी के लिए रखे, ताकि कम से कम कुछ राजस्व वापस मिल सके और शहर में कबाड़ बने इन ढांचों से छुटकारा मिल सके।





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