खरी खरी : नव संवत्सर – – – और – – – ईद मुबारक
क्या भारत के भीतर की राजनीति सत्ता की खातिर वीभत्स रूप में देश के सामने आकर खड़ी हो गई है ? क्या ये दौर फैसले की दहलीज पर आकर खड़ा हो गया है जो सभी राजनीतिक दलों के सामने चुनौती के साथ ही राजनीतिक जमीन के अस्तित्व और भविष्य को लेकर सवाल खड़ा कर रहा है ? क्या दिल्ली की सत्ता देश की सबसे बड़ी विचारधारा बनकर सत्ता के लिए देश की उस सामाजिक अवधारणा को खत्म कर देना चाहती है जिसे वर्षों तर्क वितर्क के बाद संविधान निर्मित किया गया ?
संविधान निर्माताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत की सत्ता कभी ऐसे दल के हाथों आयेगी कि संविधान के जरिए सत्ता चलाने के उसके तौर तरीके इतने बड़े हो जायेंगे कि संविधान हासिये पर चला जायेगा और उसके भीतर का सच देशवासियों को उसके अधिकार नहीं दिला पायेगा। उन्होंने तो यही सोचा था कि संविधान की शपथ लेकर सत्ता सम्हालने वाले कम से कम उसमें लिखे शब्दों के आसरे चलेंगे ही। तो क्या वाकई देश के सामने ऐसी परिस्थिति निर्मित हो गई है जहां पहली बार हर राजनैतिक दलों को तय करना है कि वे देश में पीढियों से चले आ रहे ताने-बाने को बना रहने देंगे या फिर उसे नेस्तनाबूद कर किसी दूसरे ताने-बाने के सहारे नये भारत का निर्माण करेंगे ।
सवाल है कि क्या भारत में समाज को जिस ताने-बाने के आसरे बुना गया है उस ताने-बाने को तोड़कर अपने बूते कोई अपनी राजनीति खड़ा कर सकता है या उस राजनीति के सहारे अपने बूते सत्ता में आ सकता है ? मौजूदा वक्त में देश की सत्ता में काबिज पार्टी के क्रियाकलाप सदियों से चले आ रहे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर अपनी मनुवादी सोच को थोपने के लिए हर संभव निकृष्टतम हथकंडे अपनाने से चूक नहीं रही है। और इसमें सबसे बड़ी भागीदारी उन राजनीतिक दलों की है जिनके नेताओं ने सामाजिक राजनीति का ककहरा जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर के जरिए पढा।
मौजूदा वक्त में दिल्ली की सत्ता भले ही नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी के पास है मगर अपने बूते नहीं बल्कि बैसाखियों के सहारे। सत्ता चलाने के लिए कम से कम 272 मेम्बरान चाहिए जबकि बीजेपी के पास कुल जमा 240 ही हैं। बैसाखियों के रूप में 4 बड़े राजनीतिक दल हैं चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी के 16, नितीश कुमार की पार्टी जेडीयू के 12, चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी के 5 और जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी के 2 इनको मिलाकर होते हैं 35 मेम्बर। अगर इस चौकड़ी ने मोदी बीजेपी की बाजू दबी बैसाखियों को खींच लिया तो मोदी सरकार एक झटके में औंधे मुंह गिर जायेगी। फिलहाल ऐसा कुछ लगता नहीं है फिर भी अपने ससुर नंदमुरी तारक रामाराव गारू (एनटीआर) की सत्ता और उनकी तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) को हथिया कर आंध्रप्रदेश की सत्ता में पदार्पण करने वाले नारा चंद्रबाबू नायडू, देश के सबसे बड़े राजनीति मौसम विशेषज्ञ रामविलास पासवान के राजनीतिक उत्तराधिकारी चिराग पासवान तथा चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी ने भले ही अपनी राजनीतिक जमीन और अपने वोट बैंक को बचाये रखने की खातिर ही सही अपना मुंह तो खोला वरना एनडीए में शामिल सारे घटक दलों में तो मरघट से भी ज्यादा शांति पसरी पड़ी है, वहां तो कभी-कभी मुरदों की आवाज़ सुनाई दे जाती है।
चंद्रबाबू नायडू ने मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे वक्फ़ बिल का विरोध करते हुए खुलकर कहा कि इसे सहन नहीं किया जायेगा। नायडू ने अपनी पार्टी की नीतियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि वक्फ़ की संपत्ति पर कोई आंच नहीं आने दी जायेगी, गरीब खासतौर पर मुसलमानों को ऊपर उठाकर ताकत दी जायेगी और अल्पसंख्यकों के कल्याण की हर योजना को क्रियान्वित करेंगे। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय मीडिया तो इस खबर को दबाने में लगी रही फिर भी यह खबर लोकल मीडिया के जरिए पानी में तेल की तरह फैल गई। चिराग पासवान ने एक इंटरव्यू में ईद के मौके पर बीजेपी सरकारों द्वारा मुस्लिमों के साथ किये जा रहे भेदभाव का विरोध करते हुए कहा कि आज देश के सामने बहुत बड़े और महत्वपूर्ण विषय हैं लेकिन उन पर चर्चा करने के बजाय नमाज पढ़ने पर बहस कर सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ा जा रहा है। इतने वर्षों से जो होता आया है, हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है मगर इसका सार्वजनिक तौर पर मीडिया पोस्टमार्टम किये जाने का प्रयास किया जाता है वह भी 21वीं सदी के लोगों द्वारा 17-18 वीं सदी की तरह। इसी तरह जयंत चौधरी ने भी ट्यूट करते हुए मोदी सरकार को चेताया है।
मगर अभी तक जेडीयू की तरफ से जिस तरह से नितीश कुमार ने मौन साध रखा है उससे कहीं यह बात सच तो नहीं है कि गठबंधन बदलने का ग्रीनिज रिकार्ड बना चुके नितीश कुमार मानसिक तौर पर बीमार चल रहे हैं और उसका फायदा बीजेपी उठा रही है। क्योंकि बिहार की राजनैतिक जमीन ही नहीं वहां की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियां भी इस बात की इजाजत कतई नहीं देती है। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असादुद्दीन ओवैसी तो मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे वक्फ़ संशोधन बिल के लिए साफतौर पर नाम लेते हुए चंद्रबाबू नायडू, नितीश कुमार, चिराग पासवान और जयंत चौधरी को कोस रहे हैं।
देश के भीतर आंदोलन हुए, दंगे भी हुए, दंगों के आसरे राजनीति भी हुई, धर्म की आड़ में वोटों का ध्रुवीकरण करने की बहुतेरी कोशिश की गई, अयोध्या आंदोलन के वक्त भी ऐसी परिस्थिति नहीं आई थी जो मौजूदा दौर में दिखाई दे रही है और खुलेआम ऐलान कर रही है कि हम यही चाहते हैं और इसी को पत्थर की लकीर के तर्ज पर खींच डालेंगे। इसका सबसे बड़ा कारण है इस दौर में विपक्ष का वैचारिक, आंदोलनात्मक, जन भागीदारी के तौर पर गायब हो जाना। संसद से लेकर सड़क तक उसकी मौजूदगी सिर्फ सत्ता को सम्हालने, बनाने तक ही रही है। और जहां विपक्ष की मौजूदगी नहीं होती वहां सत्तापक्ष के भीतर का अंतर्विरोध, टकराव, सत्ता के लिए एक – दूसरे को शह-मात देने की कोशिश का खेल शुरु हो जाता है।
2019 लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली की सत्ता ने तय कर लिया था कि अब हिन्दुत्व को ही देश की हकीकत के तौर पर पेश करना है क्योंकि देश के भीतर एक ऐसा हुजूम पैदा हो चुका है जो यह मानकर चलने लगा है कि हिन्दुत्व कानून से ऊपर हो गया है। जबकि देश की हकीकत यह रही है चाहे वह नेहरू का दौर रहा हो, चाहे वह लोहिया को समझने का जिक्र हो, या फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के जरिए इंदिरा गांधी को चुनौती देते समय की परिस्थितियां हों, या मंडल कमंडल का दौर रहा हो हर कालखंड में देश के भीतर की राजनीति कभी भी इतनी तीखी नहीं हुई जितनी मौजूदा वक्त में देश के ताने-बाने को तहस नहस करने तैयार है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बनी अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार द्वारा तो बकायदा पीएमओ में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता था। बाजपेई तो खुद ईद में शरीक होने निकल जाते थे। तो फिर सारी परिस्थिति एक झटके में कैसे बदल गई? जिस तरह से चंद्रबाबू, चिराग और जयंत ने मोदी सरकार को चेताया है क्या उनके साथ नितीश बिहार चुनाव के मद्देनजर अपनी राजनीतिक जमीन और वोटर्स को साधे रखने के लिए मोदी सरकार को गिराकर सियासत को बदलेंगे (क्योंकि लोकसभा में तो आंकडों का खेल ही काम करेगा) या फिर हर बार की भांति इस बार भी चूहे-बिल्ली की दौड़ साबित होगी।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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