खरी-अखरी : जब हमाम में सब नंगे तब ज्यूडीसरी जेंटलमैन कैसे?
केवल रूपयों वाली हराम की कमाई ही भ्रष्टाचार नहीं कहलाती। हराम की कमाई काम के बदले अनाज के रूप में भी ली जाती है। जायज हकों की मांगों से आंखें मूंद लेना भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। जिसे अक्सर सत्ता के शिखर पर बैठे हुए लोग करते रहते हैं, फिर वो चाहे महामहिम हों या मंत्रियों का लीडर और उसके नीचे लटके हुए मंत्री, संतरी। न्यायिक भ्रष्टाचार के तौर-तरीके भी उसी तरह के होते हैं जो लोकतंत्र के बाकी स्तंभों में नख से शिख तक विष बेल की तरह फैला हुआ है। फिर भी उसके 10 तरीकों का उल्लेख तो किया ही जा सकता है।
रिश्वतखोरी (Bribery) – न्यायाधीश अनुकूल शासनों के बदले में धन या एहसान स्वीकार करते हैं (judges accept money or favors in exchange for favorable rulings)
राजनीतिक प्रभाव (Political Influence) – निर्णय कानून के बजाय राजनीतिक आंकड़ों या पार्टियों से प्रभावित होता है (Decisions are influenced by political figures or parties rather than the law)
मुकदमा लगाना (Case Fixing) – न्यायाधीशों द्वारा कुछ व्यक्तियों या समूहों को लाभान्वित करने के लिए मामले में हेरफेर किया जाता है (Judges manipulate case outcomes to benefit certain individuals or groups)
पक्षपात और भाई-भतीजावाद (Favoritism and Nepotism) – सत्तारूढ़ मित्र मित्रों के परिवार या सहयोगियों को कानूनी योग्यता पर आधारित होने के बजाय मुंह देखी पर होती है (Ruling favors friends, family, or associates rather than being based on legal merit)
जबरदस्ती बसूली (Extortion) – न्यायाधीश या अदालत के अधिकारी न्याय के बदले में धन या एहसान की मांग करते हैं (Judges or court officials demand money or favors in exchange for justice)
चयनात्मक न्याय (Selective Justice) – कुछ मामलों को तेजी से ट्रैक किया जाता है या व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक हित के आधार पर बिलंबित किया जाता है (Some cases are fast-tracked, dismissed, or delayed based on personal or political interest)
न्यायिक पूर्वाग्रह (Judicial Bias) – नस्ल, लिंग, सामाजिक स्थिति या राजनीतिक लाभों के आधार पर पूर्वाग्रह निर्णयों को प्रभावित करता है (Prejudice based on race, gender, social status, or political benefits influence decisions)
अदालत की निधियों का दुरुपयोग (Misuse of Court Funds) – व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायिक संसाधनों का गबन या दुरुपयोग किया जाता है (Embezzlement or misallocation of judicial resources for personal gain)
निगमित (कार्पोरेट) प्रभाव (Corporate Influence) – न्यायाधीश वित्तीय लाभ के बदले व्यवसायों या अमीर व्यक्तियों के पक्ष में निर्णय करते हैं (Judges rule in favor of businesses or wealthy individuals in exchange for financial benefits)
कानून प्रवर्तन के साथ मिलीभगत (Collusion with Law Enforcement) – न्यायाधीश भ्रष्ट पुलिस या अभियोजन के साथ सहयोग करते हैं या गलत तरीके से व्यक्तियों को दोषी ठहराने के लिए सांठगांठ करते हैं (Judges cooperate with corrupt police or prosecution to frame or wrongfully convict individuals)
इन परिस्थितियों के अक्स तले तो यही दिखाई देता है कि न्याय बेचा जा रहा है। कहते भी हैं कि एक भ्रष्ट न्यायाधीश न्याय नहीं करता, वह केवल फैसले बेचता है (A corrupt judge does not judge, he simply sells verdicts)। तो फिर सवाल पर सवाल – क्या कोई खरीददार है? (Is there a buyer?)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में होलिकोत्सव की रात होलिका (भारतीय करेंसी) के अधजले अवशेषों को लेकर देशभर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर हर कोई अपने-अपने स्तर पर विश्लेषण करने में लगा हुआ है। जब लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीन पाये भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं, जब मेडिकल, इंजीनियरिंग, एजुकेशन, प्रशासन, शासन यानी समाज का हर तबका अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से ईमानदारी की अस्मिता को नोचने-खसोटने में लगा हुआ है, तो फिर ज्यूडीसरी और उसके नुमाइंदे अछूते कैसे रह सकते हैं? और उनमें ही हरिश्चंद्र का चाल, चरित्र, चेहरा देखने की चाहत क्यों? आखिरकार वे भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं। जब योगी मोह-माया के वशीभूत होकर भोगी हो सकता है, तो फिर वे तो सामान्य इंसान हैं। उनकी भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। जो मानवीय कमजोरियां आम आदमी में हैं, वही कमजोरियां ज्यूडीसरी से जुड़े हाड़-मांस वालों में भी हैं।
ऐसा नहीं है कि केवल भारत की ही ज्यूडीसरी में भ्रष्टाचार व्याप्त है, बल्कि दुनिया के हर देश की ज्यूडीसरी भ्रष्टाचार में लिप्त है। यह बात दीगर है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था की तुलना अफगानिस्तान की न्याय प्रणाली से की जाती है। आयकर अधिनियम 1961 कहता है कि अगर किसी के पास 2 लाख से ज्यादा नगदी पाई जाती है और उसका स्रोत वैध नहीं है तो आयकर विभाग उसे अवैध मानकर कार्रवाई कर सकता है। बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम 1988 में प्रावधान है कि अगर किसी के पास आय से अधिक संपत्ति या नगदी पाई जाती है और वह घोषित नहीं है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 के मुताबिक, सरकारी अधिकारियों, जिसमें जज भी शामिल हैं, की संपत्ति में असामान्य वृद्धि पाई जाती है तो उस पर आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जांच कार्रवाई कर सकता है।
मगर पिछले 10 सालों में इन विभागों द्वारा की गई कार्रवाई ने साबित कर दिया है कि ये विभाग सत्ता पार्टी के इशारों पर केवल विपक्षियों पर कार्रवाई करते हैं और जैसे ही वह विपक्षी सत्ता पार्टी में शामिल हो जाता है, सारी कार्रवाई दफन कर दी जाती है। ज्यूडीसरी की ऊंची कुर्सी पर बैठे हुए जज जब रिटायरमेंट के बाद लाभान्वित होने के लिए सत्ता के इशारे पर निर्णय देते हैं, तो फिर निचली अदालतों के जज अपनी हैसियत के हिसाब से अपना हित क्यों नहीं साध सकते हैं?
न्यायपालिका में पनप रहे भ्रष्टाचार की बेल को काटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में कुछ दिशानिर्देश बनाए थे। In 1999, the Supreme Court laid down guidelines to deal with allegations of corruption, wrongdoing, and judicial irregularity against judges of the Constitutional Court. According to the Supreme Court guidelines, on receiving a complaint, the Chief Justice will first seek a reply from the judge concerned. If he is dissatisfied with the answer or believes the matter requires further investigation, he can form an internal committee. This committee will consist of one Supreme Court Judge and two High Court Chief Justices. Bombay High Court refuses anticipatory bail to Satara Judge booked for demanding Rs. 5 lakh bribe.
एक न्यायपालिका जो सत्ता या धन के लिए झुकती है, वह अब न्याय की अदालत नहीं है, बल्कि न्याय का एक बाजार है (Judiciary bends to power and wealth; this is no longer a court of justice but a marketplace of justice). न्यायिक मूर्ति की आंखों पर शायद इसीलिए पट्टी बांधी गई थी कि सामने कितनी भी बड़ी शख्सियत खड़ी हो, मगर न्याय तथ्यों के आधार पर ही किया जाएगा।
अश्वनी बडगैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार
Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!