UP के 2027 चुनाव के लिए कांग्रेस नई रणनीति पर कर रही काम
अगर सब कुछ रहा ठीक तो यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव
कांग्रेस नेता और नेता विपक्ष (LOP) राहुल गांधी ने बुधवार 20 फरवरी को रायबरेली में अपने दौरे के दौरान एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि यदि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लोकसभा चुनाव में उनके साथ मिलकर लड़ती, तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हार का सामना करना पड़ता। राहुल गांधी के इस बयान से राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
राहुल गांधी का यह बयान उस समय आया जब एक दलित युवक ने उनसे कांशीराम और मायावती के बारे में सवाल किया। राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव से पहले बसपा को इंडिया गठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन मायावती ने इस पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया।
उत्तर प्रदेश में दो साल बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पहले से ही कुंभ मेले की सफलता और उपचुनावों में जीत के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी हुई है। हालांकि, राहुल गांधी के इस बयान के बाद यह साफ संकेत मिलता है कि अगर बसपा गठबंधन का हिस्सा नहीं बनती है, तो दलित वोटों का बड़ा ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है।
1996 में मायावती को एहसास हुआ कि कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन उनके लिए फायदेमंद नहीं था। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस से दूरी बना ली। 2017 में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला। 2022 में सपा को राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) जैसे छोटे दलों के साथ गठजोड़ का फायदा हुआ और वह 111 सीटें जीतने में सफल रही।
2024 लोकसभा चुनाव: विपक्ष के लिए सबक
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अयोध्या लोकसभा सीट भाजपा से छीनकर यह संकेत दिया कि दलित और ओबीसी वोटों का बड़ा तबका उसके साथ आ रहा है।यही वजह नजर आ रही है कि विपक्षी दलों ने 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर दी है।
बसपा के लिए खतरे की घंटी
बसपा का राजनीतिक ग्राफ लगातार गिर रहा है। मायावती के नेतृत्व में बसपा को 2019 में 10 सीटें मिली थीं, लेकिन 2024 में वह शून्य पर आ गई। विधानसभा में भी पार्टी के पास मात्र एक विधायक है। चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नए दलित नेता उभर रहे हैं, जिससे बसपा की राजनीति को चुनौती मिल रही है।
क्या मायावती को बदलनी होगी रणनीति?
मायावती को अब यह तय करना होगा कि वह भाजपा के खिलाफ खुलकर विपक्ष के साथ आएंगी या अलग राह अपनाएंगी। बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक सपा और कांग्रेस की तरफ खिसकता नजर आ रहा है। मायावती को यदि अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाना है, तो उन्हें भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से विचार करना होगा।
राहुल गांधी के इस खुलासे से साफ है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है। यदि विपक्षी दल एकजुट होते हैं, तो भाजपा के लिए आगामी चुनावों में चुनौती बढ़ सकती है। दूसरी ओर, मायावती की उदासीनता बसपा के लिए भारी पड़ सकती है। अब देखना यह है कि मायावती अपनी रणनीति में कोई बड़ा बदलाव करती हैं या नहीं।
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